जिनजी पार्श्व प्रभुथी वरश अढीसे अंतरे, होंसे चोविसमो तीर्थंकर जिन परिमाण, केशी स्वामी मुखथी एवी वाणी सांभळी, साची साची हुई ते म्हारे अमृत वाण….. हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे…..iska arth
यह पंक्तियाँ एक जैन भक्तिगीत/गरबा की हैं। सरल अर्थ (अर्थ/भावार्थ) इस प्रकार है:
- “जिनजी पार्श्व प्रभु से कुछ वर्षों के अंतराल में”
- “होंगे चौबीसवें तीर्थंकर जिन-वर (महावीर) का अवतरण”
- “ऐसी वाणी केशी स्वामी के मुख से सुनी”
- “वह अमृत-सी वाणी सच-सच सिद्ध हुई”
- “हालो हालो हालो हालो, मेरे नंदने रे”
परंपरागत संदर्भ
- श्वेतांबर परंपरा में केशी स्वामी (केशी कुमार) भगवान पार्श्वनाथ के प्रमुख गणधर माने जाते हैं; आगे चलकर उनका गौतम स्वामी से संवाद वर्णित है, जिसमें यह स्वीकार होता है कि भगवान महावीर का धर्म तत्त्वतः वही निरंतर परंपरा है, जिसका प्रवाह पार्श्वनाथ से था।
- दिगंबर परंपरा में भी केशी का संबंध पार्श्वनाथ परंपरा से माना जाता है, यद्यपि वर्णन-क्रम और विवरण कुछ भिन्न मिलते हैं। मुख्य भाव यह है कि महावीर प्रभु का प्रकट होना पूर्वाचार्यों द्वारा पूर्व-सूचित/स्वीकृत था।
सार यह गीत भक्तों को यह स्मरण कराता है कि पार्श्वनाथ की परंपरा में कही गई केशी स्वामी की वाणी सत्य सिद्ध हुई—भगवान महावीर 24वें तीर्थंकर रूप में प्रकट हुए—और इसी आनंद में “आओ-आओ” कहकर उत्सव मनाने का आह्वान है।