Aath prakarni drashti
“Aath Prakari” यानी अष्ट-प्रकारी द्रव्य-पूजा की “दृष्टि” (आन्तरिक अर्थ)
1) जल (Jal) – आत्मा को पवित्र और निर्मल रखने का संकल्प; सम्यक् दर्शन-ज्ञान-चारित्र की साधना। 2) चन्दन (Chandan) – शान्ति और ज्ञान की शीतलता; राग-द्वेष को ठंडा करना। 3) पुष्प (Pushpa) – पुष्प जैसी सुगन्धित आचरण-शुद्धि; सब जीवों हेतु करुणा व मैत्री। 4) धूप (Dhoop) – तप व संयम की भावना; स्वयं जलकर भी सुगन्ध बाँटना = निःस्वार्थ साधु-चर्या का स्मरण। 5) दीपक (Deep) – सम्यक् ज्ञान-ज्योति; मोह-अँधेरे को दूर कर सिद्ध-स्थिति का लक्ष्य। 6) अक्षत (Akshat) – अनुत्पादक चावल: “यह जन्म अंतिम बने” ऐसा अटल व्रत-निश्चय; स्थिरता। 7) नैवेद्य (Naivedya) – रस-त्याग व इन्द्रियनिग्रह; भोजन में आसक्ति कम कर निरासक्ति बढ़ाना। 8) फल (Phal) – मोक्ष-फल की कामना; निष्काम भाव से कर्तव्य कर अंत में कैवल्य-सिद्धि।
परम्परा-भेद (Digambar / Shwetambar)
- दोनों परम्पराओं में आठ द्रव्य प्रायः यही हैं; क्रम में थोड़ा अन्तर मिल सकता है (जैसे कहीं अक्षत पहले/बाद में)।
- अर्थ (दृष्टि) का सार समान है: शुद्धि, संयम, ज्ञान-ज्योति, वैराग्य और मोक्ष-लक्ष्य।
- पूजा सदा भाव-प्रधान मानी गई है; द्रव्य केवल साधन हैं, साध्य आत्म-परिष्कार है।
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