sex kese krte h jain log
जैन धर्म में ब्रह्मचर्य (celibacy) को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है, विशेषकर मुनियों (साधुओं) और साध्वियों के लिए। जैन गृहस्थ (गृहस्थाश्रम में रहने वाले) विवाहित जीवन में रहते हुए भी संयमपूर्वक और मर्यादित रूप से जीवन जीने की शिक्षा देते हैं। जैन धर्म के अनुसार, कामवासना (sexual desire) को भी एक प्रकार का कषाय (passion) माना गया है, जो आत्मा के बंधन का कारण बनता है।
गृहस्थ जैनों के लिए पाँच महाव्रतों के स्थान पर पाँच अणुव्रत होते हैं, जिनमें ब्रह्मचर्य अणुव्रत भी शामिल है। इसका अर्थ है कि वे केवल अपनी पत्नी या पति के साथ ही संबंध रखें, वह भी संयम और मर्यादा के साथ। अनावश्यक कामवासना, व्यभिचार, या किसी भी प्रकार की असंयमितता को जैन धर्म में अनुचित माना गया है।
जैन आगमों और शास्त्रों में, काम संबंधों को केवल संतानोत्पत्ति के उद्देश्य से और अत्यंत संयमपूर्वक करने की सलाह दी गई है। मुनि और आर्यिकाएँ (साध्वी) आजीवन ब्रह्मचारी रहते हैं और किसी भी प्रकार के यौन संबंध से पूर्ण रूप से दूर रहते हैं।
संक्षेप में, जैन धर्म में यौन संबंधों के विषय में अत्यंत संयम, मर्यादा और आत्म-नियंत्रण की शिक्षा दी जाती है।