महा फलदायी देने वाले स्वपन कौन से है
जैन परंपरा में “महाफलदायी” (अत्यन्त शुभ) सपनों का उल्लेख तिर्थंकरों आदि महापुरुषों की माताओं के गर्भाधान-समय के स्वप्नों में मिलता है। ये स्वप्न भावी बालक की दिव्यता और धर्म-विजय का संकेत माने गए हैं।
श्वेतांबर परंपरा (14 स्वप्न): 1) हाथी — महान बल, मर्यादा, धर्मरथ का संचालन 2) वृषभ (बैल) — धर्मबल, महान आचार्यत्व का संकेत 3) सिंह — निडरता, शौर्य, नेतृत्व 4) श्री/लक्ष्मी — ऐश्वर्य नहीं, बल्कि उत्तम मंगल-तेज 5) पुष्पमाला — कीर्ति और धर्म-सुगंध का प्रसार 6) पूर्णचन्द्र — शीतलता, शान्ति, सर्वहित 7) सूर्य — अज्ञान-अन्धकार का नाश, श्रेष्ठ ज्ञान 8) ध्वज/पताका — धर्मध्वजवाहक नेतृत्व 9) पूर्ण कलश — पूर्ण गुण, पावनता, करुणा 10) कमल-सरovar — वैराग्य, पवित्रता 11) क्षीर-सागर/समुद्र — अनन्त ज्ञान-दर्शन की व्यापकता 12) देवलोक-विमान — देवों द्वारा वन्दनीय उपदेश 13) रत्न-राशि — अनन्त गुणों का भंडार 14) निर्लोम (धूम-रहित) अग्नि — कर्म-क्षय का तेज, धर्म-पुनर्स्थापन
दिगंबर परंपरा (16 स्वप्न):
- उपर्युक्त 14 के साथ दो अतिरिक्त—
मुख्य बात:
- ये स्वप्न तिर्थंकर, चक्रवर्ती आदि महापुरुष के अवतरण का सूचक हैं; इनका फल “धर्म विजय और मोक्ष-मार्ग का प्रकाश” माना गया है।
- श्वेतांबर मत में 14, दिगंबर मत में 16 स्वप्न गिने जाते हैं; अर्थ का मूल भाव दोनों में एक ही—भावी महापुरुष की अद्वितीय पुण्य-संपदा और धर्म-प्रभा।
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