तीर्थंकरों का गर्भ समय
जैन परंपरा में “गर्भ-कल्याणक” वह पवित्र क्षण है जब तीर्थंकर‑जीव देवलोक से अवतरीत होकर माता के गर्भ में प्रवेश करता है।
गर्भ में रहने का समय
- परंपरागत मान्यता के अनुसार तीर्थंकरों का गर्भ समय 9 महीने और 7½ दिन माना जाता है।
- इस अवधि में राज्य/समाज में सुख-समृद्धि बढ़ती है और अशुभ घटनाएँ शांत होती हैं।
स्वप्नों का संकेत
- श्वेतांबर परंपरा: तीर्थंकर‑माता 14 शुभ स्वप्न देखती हैं।
- दिगंबर परंपरा: 16 शुभ स्वप्न माने जाते हैं।
अन्य पारंपरिक भेद
- श्वेतांबर परंपरा में कुछ तीर्थंकरों (जैसे भगवन् महावीर) के संबंध में “गर्भ परिवर्तन” (देवताओं द्वारा भ्रूण का स्थानांतरण) का वर्णन आता है।
- दिगंबर परंपरा इसमें गर्भ परिवर्तन को नहीं मानती; सीधा ही क्षत्राणी के गर्भाधान का वर्णन करती है।
आध्यात्मिक भाव
- गर्भ‑कल्याणक यह दर्शाता है कि अरिहंतत्व के हेतु वाले पुण्य और महापुरुषत्व का प्रभाव संपूर्ण लोक पर पड़ता है; यही कारण है कि माता‑पिता, कुल और राज्य में आनंद की लहर होती है।
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