दान दिये बिना संसार किसने घटाया
“दान दिये बिना संसार किसने घटाया?” — इसका सीधा उत्तर है: किसी ने नहीं।
जैन धर्म में दान (दया और परिग्रह-त्याग का व्यवहारिक रूप) संसार-बंधन घटाने का अनिवार्य साधन माना गया है। यह सम्यक् दर्शन–ज्ञान–चारित्र के मार्ग में सहायक पुण्य का प्रमुख कारण बनता है, राग-द्वेष को शिथिल करता है और परिग्रह-बुद्धि को घटाता है। केवल दान से मोक्ष नहीं होता, पर बिना दान-भाव के तप, स्वाध्याय और साधु-साध्वी व धर्म-संस्थाओं का पोषण संभव नहीं; इसलिए दान संसार-क्षय की यात्रा में आवश्यक सह-कारक है।
जैन परंपरा में मुख्य चार दान बताए गए हैं:
- आहार-दान: साधु-साध्वी आदि को शुद्ध आहार देना
- औषधि-दान: रोगियों/आवश्यकतानुसार औषधि देना
- अभय-दान: प्राणीमात्र को भय से रक्षा देना
- शास्त्र/ज्ञान-दान: जैन आगम-ग्रंथ, ज्ञान और धर्म-शिक्षा का प्रसार
श्वेतांबर और दिगंबर—दोनों परंपराएँ दान के इन रूपों को मानती हैं। उद्देश्य एक ही है: करुणा से प्रेरित होकर परिग्रह का त्याग और धर्म-कार्य में सहयोग, जिससे पुण्य उदय और अंतःकरण की शुद्धि होकर संसार-बंधन क्रमशः घटता है।
सार: दान-भाव के बिना संसार-क्षय का मार्ग किसी ने नहीं घटाया; और दान के साथ ही त्रिरत्न, तप, स्वाध्याय और संयम का अभ्यास करना आवश्यक है।