Navkar ke prabhav se kiski shuli Ka sihansan bana
“शूली का सिंहासन” बनने की प्रसिद्ध घटना आचार्य मंतुङ्ग (मंतुग) स्वामी से जुड़ी है—और यह भक्ति-स्तुति “भक्तामर स्तोत्र” की महिमा में वर्णित है, न कि नवकार मंत्र में। पारम्परागत जैन कथाओं में कहा गया है कि आचार्य मंतुङ्ग पर अत्याचार हुए; उनके स्तोत्र‑पाठ के प्रभाव से बन्धन टूटे, विष/नाग निरुपद्रव हुए और शूल भी सुखासन/सिंहासन समान हो गया। यह विवरण श्वेतांबर और दिगंबर—दोनों परम्पराओं में भक्तामर की महिमा-कथाओं में मिलता है।
नवकार (णमोकार) मंत्र गुण‑स्तुति है—पंच परमेष्ठी को नमस्कार—और उसकी महिमा अलग से वर्णित है; पर “शूली सिंहासन बनी” वाली विशेष घटना नवकार नहीं, भक्तामर परम्परा से संबंधित मानी गई है।