Kisne gine huye navkar se sarp ful ki mala bana
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“Sati Dradhavrata” (दृढ़व्रता) ने सर्प को फूलों की माला बनाया।
शुद्ध जैन परम्परा में यह घटना Bhaktamar Stotra की 41वीं गाथा (“Raktekṣaṇam…”) की आराधना के प्रभाव से वर्णित है—सर्प घड़े से निकला, पर मंत्र-प्रभाव से वह कोमल फूल-माला बन गया। लोक-प्रचलित बोलचाल में इसे कभी “गिने हुए नवकार” से भी कहा जाता है, पर शास्त्रीय कथा विशेषतः भक्तामर गाथा से जुड़ी मानी जाती है। Digambar–Shwetambar दोनों परम्पराओं में कथा का सार यही है कि सती दृढ़व्रता की निष्कलंक श्रद्धा और जप से उपसर्ग शान्त हुआ।