Jain Dharm Mein antim dashasutra Mein Rote Rote Keval Gyan kaise hua
संक्षिप्त, पर परंपरागत उत्तर
- “Antim Daśā-sūtra” से आपका आशय साधारणतः Antakṛddasha Sūtra (अंतकृत्-दशा) से लिया जाता है, जिसमें वे आत्माएँ वर्णित हैं जिन्होंने इस जन्म में ही संसार का “अंत” कर दिया। वहाँ और अन्य आगमिक कथाओं में कहीं-कहीं “रोते-रोते” (अत्यन्त पश्चात्ताप व करुणा से अश्रु बहते हुए) की अवस्थाएँ आती हैं; पर ध्यान रहे—केवलज्ञान रोने से नहीं, चार घाती कर्मों के पूर्ण क्षय और शुक्लध्यान से होता है। अश्रु केवल तीव्र प्रायश्चित्त, सम्वेग और मोहनीय कर्म के क्षयोपशम का बाह्य लक्षण हो सकते हैं, कारण नहीं।
- उदाहरण: ऐमुत्त मुनि (बाल मुनि) की कथा में वे विनयपूर्वक प्रatikramaṇ/क्षमायाचना के शब्द बोलते-बोलते गहन पश्चात्ताप में डूब गए; उसी निर्मल भाव-प्रवाह, निरन्तर संयम और ध्यान से उनके घाती कर्म नष्ट हुए और तत्काल केवलज्ञान प्रकट हुआ। यह “रोते-रोते” कहे जाने का आशय है—अश्रुयुक्त, पर शास्त्रोक्त साधना-फल से हुआ केवलज्ञान, न कि मात्र भावुकता से।
- तत्वदृष्टि (दोनों परम्पराएँ): दिगंबर और श्वेतांबर – दोनों में सिद्धान्त समान है कि केवलज्ञान कषाय-क्षय, सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित्र की पूर्णता और शुक्लध्यान से होता है; कथाओं के विवरण/नामों में भिन्नता हो सकती है, पर “रोना” कारण नहीं, अधिकतम सहायक भाव-शुद्धि का संकेत है।
- स्मरणीय सूत्रार्थ: केवलज्ञान तब प्रकट होता है जब
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