What is Pudgal paravatan kaal?
Pudgal Paravartan Kaal (पुद्गल-परावर्तन काल) का सरल अर्थ:
- यह जैन दर्शन में “असीम/अनन्त” समय-परिमाण को दर्शाने वाला सिद्धान्त है।
- “पुद्गल” यानी पदार्थ-मात्र (matter) और “परावर्तन” यानी निरंतर बदलना/घूम-फिरकर सब रूप धारण करना।
- इसका आशय यह है कि संसार-भ्रमण में एक जीव जब समस्त पुद्गलों (विभिन्न वर्गणाओं/शरीर-रूपों) को ग्रहण कर छोड़ देता है—अर्थात जड़-पदार्थ के सभी संभावित रूपों का पूर्ण चक्र पूरा हो जाता है—तो इतने दीर्घ काल को “पुद्गल-परावर्तन काल” कहा जाता है। यह practically अनन्त माना गया है।
मुख्य बिंदु
- उद्देश्य: समय की अत्यन्त दीर्घ, अनगिन परिकल्पना बताना—जिसमें पदार्थ के रूपों का पूर्ण चक्र पूरा होता है।
- भेद: इसे चार दृष्टियों से समझाया जाता है—(1) द्रव्य (पदार्थ), (2) क्षेत्र (लोक-आकाश के प्रदेश), (3) काल (उत्सर्पिणी–अवसर्पिणी के समय-खंड), (4) भाव (कर्म-अनुभाग आदि)। इन चारों में “बादर” (स्थूल) और “सूक्ष्म”—ऐसे दो-दो भेद माने जाते हैं, इस प्रकार कुल आठ भेद चर्चित हैं।
- अर्ध पुद्गल-परावर्तन: द्रव्य-परावर्तन का आधा काल “अर्द्ध पुद्गल-परावर्तन” कहा जाता है; इसे भी अनन्त-परिमाण रूप से माना गया है।
- व्यवहार में यह कोई गणनात्मक/प्रायोगिक समय-इकाई नहीं, बल्कि जीव के अनादि-अनन्त भ्रमण और पदार्थ-परिवर्तन की सीमा बता देने वाला दार्शनिक मानदंड है।
परम्परागत मत
- दिगम्बर और श्वेताम्बर—दोनों परम्पराएँ इसका तात्पर्य समान ही मानती हैं: पदार्थ के समग्र रूप-परिवर्तन का अनन्त काल-चक्र; सूक्ष्म शब्दावली/उदाहरणों में अंतर मिल सकता है, पर अर्थ-भाव एक ही है।
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