Akshay nidhi tap vidhi
अक्षय-निधि तप (Shwetambar परंपरा) – सरल विधि
अर्थ व उद्देश्य
- “अक्षय-निधि” का अर्थ है ऐसा पुण्य-संचय जो क्षय न हो; ज्ञान-भक्ति बढ़े और कषाय शान्त हों। यह तप प्रायः श्रावकों द्वारा सामूहिक रूप से किया जाता है। ( jainsite.com)
समय व अवधि
- बहुत-सी स्थानक/मूर्ति-पूजक श्वेतांबर परंपराओं में यह तप पर्यूषण से पूर्व लगभग 15 दिनों तक एकासन सहित किया जाता है; कुछ परंपराएँ भाद्रपद वदी 4 से आरम्भ बताती हैं और सम्वत्सरी/समापन‑दिन उपवास रखती हैं। स्थानीय रीति के अनुसार आरम्भ‑तिथि/अवधि भिन्न हो सकती है। ( hindi.webdunia.com, jainsite.com)
नियम (पच्चक्खाण)
- सम्यक् संकल्प लें: आज से अक्षय‑निधि तप करूँगा/करूँगी; एकासन, चोविहार, मिथ्यात्व से रक्षा, क्रोध‑मान आदि का त्याग, स्वाध्याय‑समय का नियम। आवश्यक हो तो गुरु/समाज की सान्निधि में पच्चक्खाण लें। ( jainsite.com)
दैनिक विधि 1) प्रातः स्नात्र‑पूजा/देव वंदन के बाद कलश‑स्थापना: बाजोट पर चावल से 51 स्वस्तिक/साथिया बनाकर उस पर बादाम, सुपारी, पतासा तथा यथाशक्ति द्रव्य अर्पित करें; कलश के समक्ष नमस्कार‑जप करें. ( jainsite.com) 2) क्षमापना व आवश्यक: “खमासमण” देकर इरियावहियं‑प्रतिक्रमण, काउस्सग्ग (नवकार/लोगस), फिर चैत्यवंदन/स्तवन। ( jainsite.com) 3) आहार‑नियम: दिन में एक ही बार एकासन; सूर्यास्त के बाद जल भी न लें (चोविहार). दुर्बलता/आरोग्य‑स्थिति अनुसार गुरु‑परामर्श लें। ( hindi.webdunia.com) 4) स्वाध्याय‑भक्ति: प्रतिदिन श्रुत‑भक्ति, ज्ञान‑महिमा‑स्तवन, सामायिक/प्रतिक्रमण, ध्यान और दान‑वैयावृत्य का अभ्यास रखें। ( jainsite.com)
समाप्ति (परण)
- अंतिम दिन प्रातः आवश्यक‑वंदन, कलश‑पूजन, स्तवन/जयवियराय पाठ के साथ क्षमापना; नियमानुसार पारण करें। तप‑समाप्ति पर साधु‑साध्वी/तपस्वियों का मान‑प्रतिष्ठा व दान दें। ( jainsite.com)
महत्व
- परंपरा के अनुसार यह तप आत्मिक‑दैहिक‑मानसिक ताप शान्त कर पुण्य‑सम्पदा बढ़ाने वाला माना गया है; “अक्षय” फल की कामना से किया जाता है। ( hindi.webdunia.com)
परंपरा‑भेद
- यह तप मुख्यतः श्वेतांबर समाज में प्रचलित है; दिगंबर परंपराओं में नाम/विधि प्रचलन सार्वत्रिक नहीं है, अतः स्थानीय आचार्य/समाज‑रीति देखें। ( jainpedia.org)
टिप्पणी
- उपर्युक्त रूपरेखा लोकप्रचलित श्वेतांबर विधि का संक्षेप है; स्थान/समय के अनुसार कुछ पाठ और क्रम बदल सकते हैं—अपने गुरु/समाज की मान्य विधि का ही अनुसरण करें। ( jainsite.com)
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