जैन जीवीचार में 11 क्या होता है
“जैन जीव-विचार” में जीवों का एक परंपरागत वर्गीकरण 11 प्रकार से बताया जाता है। संक्षेप में:
स्थावर (एकेन्द्रिय) – 6 प्रकार
- पृथ्वी-काय (मिट्टी आदि में जीव)
- आप-काय (जल में रहने वाले जीव)
- तेज-काय (अग्नि/ऊष्मा में जीव)
- वायु-काय (हवा में जीव)
- वनस्पति-काय – व्यक्तिगत (प्रत्येक-वनस्पति)
- वनस्पति-काय – सामान्य/साधारण (साधारण-वनस्पति; अनन्तकाय)
त्रस (चलायमान) – 5 प्रकार
- द्वेन्द्रिय (दो इन्द्रियों वाले)
- त्रेन्द्रिय (तीन इन्द्रियों वाले)
- चतुरेन्द्रिय (चार इन्द्रियों वाले)
- पञ्चेन्द्रिय अमनस्क (पाँच इन्द्रियाँ, परन्तु मन नहीं)
- पञ्चेन्द्रिय मनस्क (पाँच इन्द्रियाँ और मन सहित)
अर्थ – पहले पाँच स्थावर हैं; वनस्पति को दो भागों में बाँटने से एकेन्द्रिय कुल 6 हो जाते हैं। – उसके बाद 2-, 3-, 4- और 5-इन्द्रिय (मन सहित/मन रहित) मिलाकर 5 त्रस प्रकार होते हैं। – इस प्रकार कुल 6 + 5 = 11 प्रकार बताए जाते हैं।
यह वर्गीकरण दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों परम्पराओं में स्वीकार्य है।