kamabhoomihim chaityavandan sutra
आपने “kamabhoomihim” (कम्मभूमिंहि/कम्मभूमीसु) वाला चैत्यवंदन सूत्र पूछा है। यह शब्द चैत्यवंदन के “कुलक” (Kulakam) भाग में आता है, जहाँ समवसरण का वंदन/वर्णन है। प्रचलित श्वेतांबर पाठ की पंक्ति इस प्रकार मिलती है:
मूल (प्राकृत, देवनागरी): “छउमत्थसमोसरणस्थ, तहय मुक्खत्थ तिण्णिवत्थाओ। तिदिसि निरक्खण विरई, तिरिसाणिरया कम्मभूमीसु॥”
रोमन: “Chaummattha-samosaraṇa-stha, tahaya mukkhattha tiṇṇi-vatthāo. Tidiṣi nirakkhaṇa virai, tiriśā-nirayā kammabhūmīsu.”
सरल अर्थ (अर्थ):
- यह समवसरण (जिनपीठ) छह भागों/विभागों वाला है; आगे (मुखभाग) में तीन प्रमुख आसन/स्थान प्रतिष्ठित हैं।
- देव (तीदिश/तिदिशि = त्रिदश) निरन्तर इसे निहारते हैं।
- यह समवसरण तिर्यंचों, नरकों और विशेषतः कर्मभूमियों (कम्मभूमि) में प्रत्यक्ष/पूज्य बनता है; अर्थात जिनराज का दिव्य उपदेश कर्मभूमि में ही प्रवर्तित होता है जहाँ तीर्थंकर प्रकट होते हैं।
परम्परा-सूचना:
- श्वेतांबर मूर्तिपूजक परम्परा के चैत्यवंदन में यह “कुलक” पद्य रहता है; शब्द-रचना/विराम में छोटे भेद मिल सकते हैं।
- दिगंबर परम्परा में चैत्यवंदन/प्रतिक्रमण की रचना, क्रम और पद्यों के पाठ भिन्न हैं; “कम्मभूमि” की तत्त्व-भावना (तीर्थंकरों का अवतरण कर्मभूमि में) समान रहती है, पर यही पंक्ति उसी शब्दावली में सामान्यतः नहीं पढ़ी जाती।
संक्षिप्त संदर्भ-तत्त्व:
- “कम्मभूमि/कर्मभूमि” जैन भूगोल का वह प्रदेश है जहाँ पुरुषार्थ/धर्म-साधना हेतु उपयुक्त परिस्थितियाँ होती हैं और यहीं तीर्थंकर जन्म लेते हैं व समवसरण आयोजन होता है; इसलिए कुलक-पद्य में “कम्मभूमीसु” का उल्लेख आता है, जो उस आध्यात्मिक और व्यवहारिक केन्द्रता को दर्शाता है।
यदि आपको पूरा चैत्यवंदन क्रम सरल अर्थ सहित चाहिए—नमस्कार, लोगस, उvasग्गहरं, शक्रस्तव, कुलक, आदि—तो मैं पारम्परिक पाठ्यक्रमानुसार संपूर्ण पाठ और अर्थ दे सकता हूँ।