नीचे “करेमि भंते” से जुड़ी सरल प्रश्न–उत्तर दिए जा रहे हैं, पारंपरिक जैन दृष्टि के अनुसार।
- प्रश्न: “करेमि भंते” का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर: अर्द्धमागधी प्राकृत में इसका अर्थ है— “हे भंते! मैं (यह साधना) करता/करूँगा।” यह विनयपूर्वक स्वीकृति है।
- प्रश्न: यह कब बोला जाता है?
उत्तर: सामायिक, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान आदि साधनाओं की शुरुआत में— गुरु, अरिहंत–तीर्थंकर स्वरूप या धर्मासन के समक्ष— अपनी साधना के संकल्प हेतु।
- प्रश्न: “करेमि भंते” का मूल सूत्र (करेमि भंते सूत्र) क्या है?
उत्तर: प्राकृत:
“करेमि भंते! सामाइयं, सावज्जं जोगं पच्चक्खामि | जाव नियमं पज्जुवासामि, दुविहं, तिविहेणं, मणेणं, वायाए, काएणं, न करेमि, न कारवेमि || तस्स भंते! पडिक्कमामि, निंदामि, गरिहामि, अप्पाणं वोसिरामि ||”
सार्थ अर्थ (सरल हिंदी): “हे भंते! मैं सामायिक करता/करूँगा और उसके समय में सभी दोषयुक्त प्रवृत्तियों का त्याग करता हूँ। दो प्रकार से (स्वयं न करना, दूसरों से न कराना) और तीन मार्गों से (मन, वचन, काय) किसी भी पापकर्म को न करूँगा, न कराऊँगा। जो दोष हुए हैं, उनका प्रatikraman (स्वीकृति–भवना) करता हूँ, उन्हें निंदित–गर्हित मानकर छोड़ता हूँ।”
- प्रश्न: इसकी आध्यात्मिक भावना क्या है?
उत्तर: समता में स्थित होकर पापकर्मों का त्याग, आत्मशुद्धि और संयम–संकल्प को दृढ़ करना; 48 मिनट की सामायिक अवधि में मन–वचन–काय से पाप न करना/न कराना/न अनुमोदना करना।
- प्रश्न: श्वेताम्बर और दिगम्बर परम्परा में कोई भेद?
उत्तर: श्वेताम्बर परम्परा में प्रायः प्राकृत “करेमि भंते” बोला जाता है। दिगम्बर परम्परा में भाव वही है, पर उच्चारण/भाषा कभी-कभी संस्कृत रूप में मिलता है जैसे “करोमि भगवन्” आदि। तत्त्वार्थ और साधनाभाव एक ही है।
- प्रश्न: क्या इसे अकेले घर पर कहा जा सकता है?
उत्तर: हाँ। मूर्ति/प्रतिमा, धर्मध्यान–स्थल या अंतर्मुख भाव से भी, विनय और समता के साथ।
- प्रश्न: क्या–क्या त्याग का संकल्प निहित है?
उत्तर: दुविधा से— “न करेमि, न कारवेमि” तथा तीन द्वारों से— “मन, वचन, काय” द्वारा पाप का परित्याग; हुए दोषों का आलೋचना–प्रतिक्रमण और आगे न दोहराने का प्रत्याख्यान।
अधिक पढ़ने और मूल पाठ/सरल अर्थ के लिए:
- करेेमि भंते सूत्र का पाठ व अर्थ
- प्रतिक्रमण व सामायिक का संक्षिप्त विवेचन