सात प्रकार के समुद्र घात
आप जिस “समुद्र-घात” के बारे में पूछ रहे हैं, उसका सही जैन शब्द है “समुद्घात” (Samudghāta)। अर्थ: जीव का अपनी देह (नौकारी शरीर) को छोड़े बिना अपने चेतन-प्रदेशों का बाहर की ओर विशेष विस्तार/प्रसारण करना, और कार्य पूर्ण होने पर पुनः संकुचित होकर देह में ही स्थित हो जाना।
जैन दर्शन में समुद्धात के सात प्रकार बताए गए हैं: 1) वेदना-समुद्घात: असह्य शारीरिक/मानसिक वेदना के कारण जीव का चेतन-प्रसारण होना। 2) कषाय-समुद्घात: क्रोध, मान, माया, लोभ आदि प्रबल कषाय के उदय से प्रसारण। 3) वैक्रीय-समुद्घात: वैक्रीय (विकारी/लचीले) शरीर के रूप-परिवर्तन, छोटा-बड़ा होना या अनेक रूप बनाना आदि हेतु प्रसारण। 4) मरणान्तिक-समुद्घात: मृत्यु के ठीक पूर्व अगली योनि/गति के स्पर्श-स्थल तक चेतन-प्रसारण कर लेना। 5) तेजस-समुद्घात: तेजस (ऊर्जा/तेज) शरीर के सहारे शुभ या अशुभ कार्य-सिद्धि हेतु विशेष प्रसारण। 6) आहारक-समुद्घात: छठे गुणस्थान तक पहुँचे साधु द्वारा शंका-निवारण आदि हेतु आहारक शरीर (एक हस्त के श्वेत पुरुषाकार) का निर्मित कर केवलज्ञानी/विदग्ध आचार्य के पास भेजना। 7) केवलि-समुद्घात: विशेष कर्म-परिस्थिति में केवलज्ञानी जीव का समस्त लोक में अतिशय प्रसारण कर पुनः संकुचित हो जाना।
परम्परा-सूचना:
- दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों परम्पराओं में समुद्धात के यही सात भेद स्वीकृत हैं। विवरण के सूक्ष्म उदाहरणों में भिन्नता मिल सकती है, पर अर्थ और उद्देश्य एक ही माने जाते हैं।
यह व्याख्या जैन आगम/प्रामाणिक ग्रंथ-परम्परा (जैसे द्रव्यसंग्रह, तिलोयपण्णत्ति और तत्त्वार्थसूत्र-व्याख्याएँ) पर आधारित है।