Jain dharam mi kisi kasayi ka ullekh h
“कसायी” शब्द से आप क्या कहना चाहते हैं, उसके दो अर्थ बनते हैं:
1) कषाय (Kaṣāya) – जैन धर्म में यह बहुत महत्त्वपूर्ण विषय है
- चार मुख्य कषाय: क्रोध, मान, माया, लोभ।
- यही आत्मा के सबसे बड़े शत्रु माने गए हैं; मोक्ष-मार्ग में बाधा बनते हैं।
- शास्त्रों में अठारह पाप‑स्थानकों में भी इनका स्पष्ट उल्लेख है (जैसे क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष आदि).
- दिगम्बर और श्वेताम्बर—दोनों परम्पराएँ चार कषायों को समान रूप से स्वीकार करती हैं; अर्थ में कोई मतभेद नहीं है.
2) कसाई (Butcher) – प्राणी‑हिंसा वाला व्यवसाय
- जैन धर्म का प्रथम व्रत अहिंसा है; इसलिए हत्या/काट‑कपट पर आधारित व्यवसाय (जैसे कसाई, मछुआरा, शिकारी आदि) अनुचित माने गए हैं।
- श्रावकाचार में जीव‑हिंसा कराने/करवाने/समर्थन करने से बचने की दृढ़ शिक्षा है; आजीविका भी यथासम्भव अहिंसक रखनी चाहिए.
- दिगम्बर‑श्वेताम्बर—दोनों परम्पराएँ हिंसक व्यवसायों से निवृत्ति ही सिखाती हैं.
सार:
- “कषाय” का उल्लेख तो जैन दर्शन का केन्द्रीय भाग है—क्रोध, मान, माया, लोभ को क्षीण करना ही साधना का लक्ष्य है।
- “कसाई” जैसे हिंसक व्यवसाय जैन धर्म में वर्जित/अप्रशस्त माने गए हैं, क्योंकि वे अहिंसा के विरुद्ध हैं।