Give me meaning of full halardu in hindi
नीचे “महावीर स्वामी हालरडु” (माता त्रिशला के स्वरों में गाया गया जैन स्तवन) का सरल, पारम्परिक भावार्थ क्रमवार दिया जा रहा है:
1) माता त्रिशला झूला झुलाती हैं, सोने-रुपे से जड़े पालने, रेशमी डोर और घुंघरियों की मधुर ध्वनि के बीच, “मेरे प्यारे लाल” कहकर स्नेहभरा लोरी-गीत गाती हैं।
2) वे कहती हैं— प्रभु पार्श्वनाथ के समय से चली आ रही परम्परा और केशीस्वामी की वाणी के आधार पर निश्चित है कि यह बालक चौबीसवाँ तीर्थंकर होगा; यह अमृतवत सत्य है।
3) स्वप्नों का सार यह बताता है कि जन्म तो चक्रवर्ती का भी हो सकता था, पर केशी गणधर की वाणी से स्पष्ट है— तुम “जिनराज” (तीर्थंकर) ही हो, चौबीसवें जिनराज।
4) “मेरे गर्भ में तीन लोक के शिरोमणि, भवसागर से पार लगाने वाले, संघ-तीर्थ की लाज रखने वाले आये हैं; आज मैं अपने पुण्य का फल देख रही हूँ।”
5) माता अपने गर्भ-लक्षणों/दोहलों का उल्लेख करती हैं— हाथी पर बैठना, सिंहासन, चँवर-छत्र— सब इस दिव्य शिशु के तेज से जुड़ा हुआ अभिनन्दन है; उस दिन की स्मृति से तन-मन पुलकित है।
6) “तेरे हस्त-पाद तल पर 108 शुभ-लक्षण हैं; इससे निश्चय हुआ कि तू जगदीश्वर जिनवर है। तेरी दाहिनी जाँघ पर ‘सिंह’ का चिह्न है— यह मैंने स्वप्न में पहले ही देखा था।”
7) नन्दिवर्धन आदि बंधु-बांधव इस सुकुमार बालक पर स्नेह लुटाते हैं; हँसी-खेल में गोद में उठाते, गालों पर प्यार करते, परिवार में हर्ष की लहर है।
8) मातुल (मामा-पक्ष) के अनेक स्नेही भी दुलार करते हैं— गोद में उछालते, नन्हें-से भांजे के गालों को चूमते— अपार स्नेह और अपनापन छलकता है।
9) मामा-मामी की ओर से रत्न-जड़ित टोपी, सुन्दर जालरें, मोतियों की कसीदाकारी और नीले-पीले-लाल रंगों के उत्तम वस्त्र— बालक को पहनाने के लिए आते हैं।
10) वे मिठाइयाँ, लड्डू, चूरमा आदि स्नेह-भरे उपहार लाते हैं; मामी बालक का मुख देखकर पुलकित होती हैं— “जीओ, सुख से भरे रहो” ऐसी आशीष देती हैं।
11) पितृकुल की स्त्रियाँ और राजकुल की सहेलियाँ भी भर-भरकर नेग-उपहार लाती हैं; बालक के दर्शन से सबके हृदय में परम आनन्द उमड़ता है।
12) खेलने के लिए लाख की घुंघरू, चिड़ियाँ-हिरन-हंस-मोर जैसी खिलौना-प्रतिमाएँ आदि— नाना प्रकार के रमणीय उपहार दिए जाते हैं; बालक के आनंद-विनोद की सामग्री सजती है।
13) छप्पन कुमारी देवांगनाएँ कलशों का अमृतजल लाकर स्नान करवाती हैं; पुष्प-वृष्टि होती है, और वे दीर्घायु-मंगल की अनेक आशीषें देती हैं।
14) देवराज इन्द्र मेरु पर अभिषेक कराते हैं; माँ कहती हैं— “तेरे मुख पर करोड़ों चाँद न्योछावर, तेरे तन पर समस्त ग्रह-नक्षत्रों का वैभव समर्पित।”
15) आगे चलकर शिक्षा की बात आती है— राजसी साज-सामान सहित अध्ययन के लिए भेजना, विद्या के साथ सद्गुणों का संस्कार— यह सब बालक के कल्याण हेतु।
16) सांसारिक रीति से विवाह-योग्य होने पर उपयुक्त वधू के साथ परिणय का उल्लास— परिवारजन हर्ष से भरे हैं, युगल का आदर-सत्कार होता है। (यह माँ के सांसारिक कल्पनाएँ हैं; आगे चलकर प्रभु वैराग्य ले कर दीक्षा ग्रहण करते हैं।)
17) “तेरे आने से हमारा आँगन अमृत-दूध से सरस हुआ, देव-वृक्षों की मानिन्द सुख का फल लगा”— कुल और जगत में मंगल-समृद्धि का प्रस्फुरण हुआ।
18) अंत में— “माता त्रिशला ने यह लोरी गाई; जो भी श्रद्धा से इसे गाए, उसे पुत्र-समृद्धि का सौभाग्य मिले”— और कवि दीपविजय द्वारा रचित होने का उल्लेख आता है; स्तुति का जय-मंगल गान होता है।
अत्यन्त आवश्यक बात
- यह एक पारम्परिक जैन स्तवन है, आगमिक सूत्र नहीं। दिगंबर और श्वेतांबर— दोनों परम्पराओं में इसका भावार्थ समान ही माना जाता है; उद्देश्य केवल महावीर प्रभु के जन्म-मंगल और तीर्थंकर-लक्षणों का गौरव-गान है।