56 deepkumari tirthankar ko kya ashirvad deti hae
“56 Dikkumārī” (दिक्कुमारियाँ) वे देवियाँ हैं जो तीर्थंकर के गर्भावतरण और जन्म-कल्याणक पर आकर उनकी सेवा–पूजा करती हैं। वे वास्तव में कोई लौकिक वरदान नहीं देतीं, बल्कि अत्यंत मंगल आशीर्वाद और शुभ कर्म करती हैं, जिससे जगत में धर्म का प्रभाव बढ़े। संक्षेप में उनके आशीर्वाद/कार्य इस प्रकार माने जाते हैं:
- मंगलाशिष: “सकल जीवों का कल्याण हो, धर्म का प्रकाश फैले, अहिंसा–सम्यक्दर्शन स्थिर रहे।”
- अभय और करुणा की स्थिरता: तीर्थंकर के निर्भय, करुणामय उपदेश-कार्य के लिए शुभाशंसाएँ।
- जनमाभिषेक और शृंगार: दिव्य जल से स्नान, चंदन/कुंकुम का लेप, पुष्प-वृष्टि, दीप-आरती — यह सब मंगल का प्रतीक है।
- धर्मप्रभावना का संकल्प: आगे चलकर तीर्थ-स्थापना, संघ-व्यवस्था और उपदेश-चक्र निर्विघ्न रहे — ऐसी शुभ कामनाएँ।
- लोक-कल्याण की घोषणाएँ: देव-नगरी में और पृथ्वी पर “महावीर/तीर्थंकर का अवतरण हुआ” — इस प्रकार के मंगल-घोष, जिससे सत्प्रवृत्ति जागे।
महत्वपूर्ण बात: तीर्थंकर को सिद्धत्व या केवलज्ञान “किसी आशीर्वाद से मिलता” नहीं है—यह उनके अनंत पूर्व-संचित पुण्य और साधना का फल है। दिक्कुमारियों का आगमन और आशीर्वाद पूजा-सम्बन्धी मंगल-विधि है, जिससे जगत में शुभता और धर्म-जागरण का संदेश फैलता है।
(श्वेताम्बर परंपरा के कल्पसूत्र आदि में 56 दिक्कुमारियों की सेवा-परंपरा का वर्णन मिलता है; दिगम्बर परंपरा में भी जन्म-कल्याणक पर देवियाँ/देवों द्वारा अभिषेक–पूजन और मंगलाशिष का निरूपण है।)