Prmata ki vani kitne yojan tak
संक्षिप्त, पर परंपरानुसार उत्तर
- यदि आपका आशय “प्रमत्त मुनि” (प्रमत्त-सम्यत साधु) से है, तो जैन आगमों में उनकी वाणी कितने “योजन” तक सुनाई देती है—ऐसा कोई निश्चित माप निर्धारित नहीं बताया गया है। साधु की वाणी सामान्यतः निकट श्रोताओं तक ही व्यवहारतः पहुँचती मानी गई है।
- तीर्थंकर/अरिहंत की दिव्य-ध्वनि (समवसरण में) के विषय में परंपरागत वर्णन यह है कि वह चारों दिशाओं में एक-एक योजन की परिधि तक श्रोताओं द्वारा सुनी-समझी जाती है; वह अपने आप सभी भाषाओं में अर्थग्रहण योग्य होती है। इस कथन में दिगंबर–श्वेतांबर दोनों परंपराओं का भाव एक ही है; समवसरण का आकार-प्रमाण अवगाहना के अनुसार बड़े–छोटे रूप में वर्णित है, पर वाणी के सुनाई पड़ने का परंपरागत माप एक योजन बताया गया है।
निष्कर्ष
- “प्रमत्त की वाणी” के लिए शास्त्रों में योजन-परिमाण निश्चित नहीं।
- “तीर्थंकर की वाणी (दिव्य-ध्वनि)” समवसरण में एक योजन तक सुनाई पड़ने का पारंपरिक वर्णन मिलता है।