ईर्यापथीकि दण्ड क्रिया कोनसी है?
संक्षेप में: “ईर्यापथिकी दण्ड-क्रिया” = चलने-फिरने (ईर्या-पथ) के समय अनजाने में हुई हिंसा आदि दोषों का प्रायश्चित्त।
स्पष्ट अर्थ
- ईर्या = चलना/गति, पथिकी = मार्ग से संबंधित।
- दण्ड-क्रिया = प्रायश्चित्त (दोष का परिमार्जन)।
- इसलिए ईर्यापथिकी दण्ड-क्रिया वह प्रायश्चित्त है जिसमें हम स्वीकृत करते हैं कि चलते, उठते, बैठते, सोते, जल-धारा उपयोग, झाड़ने-बुहारने आदि में सूक्ष्म जीवों को हानि हो सकती है; उसके लिए क्षमा मांगते हैं, पश्चात्ताप करते हैं और आगे सावधानी रखने का संकल्प लेते हैं।
परंपरागत विधि
- श्वेतांबर परंपरा: प्रातिक्रमन में प्रारम्भ में “ईर्या-वहियाए” (īryā-vahiyae) नामक सू़त्र द्वारा चलन से हुई हिंसा का अलोचना–प्रातिक्रमन–प्रत्याख्यान किया जाता है, और कायोत्सर्ग से स्थिर होकर क्षमा याचना की जाती है।
- दिगंबर परंपरा: समयिक/प्रतिक्रमण में “ईर्या-समिति” को जागृत रखते हुए चलने आदि में हुए अपराधों का स्मरण-क्षमा और आगे सावधानी का दृढ़ संकल्प किया जाता है (अलोचना, प्रातिक्रमन, प्रत्याख्यान, कायोत्सर्ग का भाव).
मुख्य भाव
- स्वीकार (अलोचना): “मुझसे मार्ग-गमन में हिंसा हुई होगी।”
- पश्चात्ताप (प्रातिक्रमन): “उसका मैं हृदय से खेद करता/करती हूं।”
- संकल्प (प्रत्याख्यान): “आगे अधिक सावधानी रखूंगा/रखूंगी।”
- स्थिरता (कायोत्सर्ग): “थोड़ी देर निरिच्छ और शान्त भाव से स्थित होकर क्षमा-भाव।”