समवशरण है, वैर विरमन का स्थल
आपका वाक्य “समवशरण है, वैर-विरमन का स्थल” बिल्कुल सही है।
सरल अर्थ:
- समवशरण = वह दिव्य उपदेश‑मंडप जो तीर्थंकर को केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद देवों द्वारा रचा जाता है।
- वैर‑विरमन का स्थल = जहाँ शत्रुता, भय और हिंसा स्वतः शांत हो जाती है।
क्यों कहा जाता है वैर‑विरमन का स्थल?
- समवशरण में सभी जीव—देव, मनुष्य, पशु‑पक्षी—निर्भय होकर एकत्र होते हैं।
- प्राकृतिक शत्रु भी (जैसे सिंह और गाय) वहाँ शांतिपूर्वक साथ बैठते हैं; किसी को किसी से भय नहीं रहता।
- तीर्थंकर की दिव्य‑ध्वनि सबको अपनी‑अपनी भाषा में समझ आती है, इसलिए भ्रम, विवाद और वैमनस्य मिट जाता है।
- वहाँ अहिंसा, समता और करुणा का ऐसा प्रभाव रहता है कि हिंसक वृत्ति स्वतः रुक जाती है—इसीलिए इसे वैर‑विरमन (वैर का विराम) कहा गया है।
परम्परागत समझ:
- दिगंबर और श्वेतांबर—दोनों परम्पराएँ समवशरण को तीर्थंकर के समत्व‑उपदेश का सार्वभौमिक मंच मानती हैं, जहाँ सभी जीवों को समान धर्मोपदेश मिलता है और शांति का अनुभव होता है।
- संरचना और विवरणों में कुछ भेद वर्णित हैं, पर “वैर‑विरमन का स्थल” के रूप में उसका सार अर्थ दोनों में समान है।