10 shravak ya 11 Gandhar se pratishruti ka koi sambandh
संक्षिप्त उत्तर:
- “प्रतिश्रुति/पच्चक्क्खाण (प्रत्याख्यान)” का सीधा संबंध श्रावक के व्रतों और प्रतीमाओं से है—यानी कोई श्रावक अपने आचरण-व्रत औपचारिक संकल्प के रूप में “प्रतिश्रुति” देकर स्वीकार करता है।
- “११ गांधर (गणधर)” तीर्थंकर के प्रधान शिष्य हैं; उनका “प्रतिश्रुति” या श्रावक-व्रतों की संख्या से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है।
- “१० श्रावक” जैसा प्रयोग प्रामाणिक वर्गीकरण नहीं है; प्रचलन में 12 व्रत (5 अनुव्रत, 3 गुणव्रत, 4 शिक्षा-व्रत) और घर-गृहस्थ के 11 प्रतीमा मानी गई हैं। “दशलक्षण धर्म” (10 गुण) भी मुख्यतः सद्गुण-चिंतन है, यह “गांधर” या किसी विशेष “प्रतिश्रुति-संख्या” से नहीं जुड़ा।
थोड़ा विस्तार:
- श्रावक जब 12 व्रत धारण करता है या 11 प्रतीमाओं में क्रमशः आगे बढ़ता है, तो वह गुरु/आर्य के समक्ष या स्वयं नियमपूर्वक “प्रत्याख्यान” करता है—इसे ही सामान्य बोलचाल में “प्रतिश्रुति” कह देते हैं। यह नैतिक-संयम की प्रतिज्ञा है, कोई अलग स्वतंत्र सिद्धांत नहीं।
- 11 गणधर (जैसे महावीर प्रभु के गौतमस्वामी, सुधर्मा आदि) सिद्धांत-परंपरा के संरक्षक और उपदेशक हैं; उनका कार्य श्रुतज्ञान का संरक्षण-प्रसार है, न कि गृहस्थ-श्रावक के व्यक्तिगत प्रतिज्ञा-विधि से संख्या-आधारित सम्बद्धता बनाना।
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