आपके हाथ की मुट्ठी में कितने प्रकार के जीव हैं कौन से जीव है विस्तार से बताओ
जैन धर्म में कहा गया है कि प्रत्येक सूक्ष्म स्थान में असंख्य जीव होते हैं। इसलिए आपके हाथ की मुट्ठी में भी अनगिनत (असंख्यात) जीव उपस्थित रहते हैं। यहाँ “कितने प्रकार” से आशय मुख्य वर्गों से है:
मुख्यतः 5 प्रकार के एकेन्द्रिय (स्थावर) जीव वहाँ अवश्य होते हैं:
- पृथ्वी-कायिक (पृथ्वी-जीव): हथेली पर लगी धूल, कण, त्वचा से झड़े कण आदि में रहने वाले सूक्ष्म जीव।
- आप-कायिक (जल-जीव): हथेली की नमी, पसीना, जल-वाष्प के सूक्ष्म कणों में रहने वाले जीव।
- तेज-कायिक (अग्नि/ऊष्मा-जीव): शरीर की ऊष्मा, ताप-ऊर्जा से संबद्ध सूक्ष्म जीव।
- वायु-कायिक (हवा-जीव): मुट्ठी के भीतर बंद हुई हवा और उसके प्रवाह में रहने वाले जीव।
- वनस्पति-कायिक (वनस्पति-जीव): सूक्ष्म बीजाणु/पराग-धूल जैसे वनस्पति-तत्वों में रहने वाले जीव; साथ ही अत्यन्त सूक्ष्म निगोद जैसी वनस्पति-वर्ग की अवस्थाएँ भी सर्वत्र मानी गई हैं।
इनके अतिरिक्त, परिस्थिति के अनुसार कभी-कभी त्रस-जीव (चलने-फिरने वाले 2, 3, 4, 5 इन्द्रियों वाले—जैसे सूक्ष्म कीट आदि) भी हाथ पर आ-जा सकते हैं, पर सामान्य, स्वच्छ मुट्ठी में जो नित्य उपस्थित माने जाते हैं, वे ऊपर बताए पाँच स्थावर वर्ग हैं।
कुछ आवश्यक बातें
- संख्या निश्चित नहीं बताई जाती; जैन आगमों में इन्हें असंख्यात/अनन्त कहा गया है—अर्थात गिनती से परे सूक्ष्म जीव।
- “निगोद” अत्यन्त सूक्ष्म एकेन्द्रिय वनस्पति-वर्ग के जीव माने गए हैं, जो सर्वव्यापी हैं। दोनों परम्पराएँ (दिगम्बर एवं श्वेताम्बर) निगोद का उल्लेख करती हैं; कुछ ग्रन्थों में इनके भेद (नित्य-निगोद, इतरा-निगोद) का भी वर्णन मिलता है। मूल तथ्य—वे अत्यन्त सूक्ष्म, सर्वत्र विद्यमान और असंख्य हैं—पर सभी का मत एक समान है।
- यही समझ अहिंसा की भावना को दृढ़ करती है—कि हमारी छोटी क्रियाओं में भी अनजाने अनेक जीवों का स्पर्श/उल्लंघन हो सकता है; अतः सजगता, संयम और सावधानी आवश्यक है।
यदि आप जीव-तत्त्व, स्थावर-त्रस भेद, पंच-काय और निगोद का मूलभूत परिचय और सरल सार एक जगह पढ़ना चाहें, तो देखें: