राजीमती ने रहनेमी को उपमा दी
हाँ। जैन परंपरा में प्रसिद्ध प्रसंग है कि सती राजीमती (राजुल) ने रथनेमी (भगवान नेमिनाथ के छोटे भाई/यादव कुल के वीर) को वैराग्य की तीव्र “उपमा” देकर उसकी काम-वृत्ति रोकी थी।
घटना का संक्षेप
- वर्षा में भीगकर राजीमती एक गुफा में ठहरीं। वहाँ तप में लीन रथनेमी की चित्तवृत्ति डोल गई।
- सती राजीमती ने संयमपूर्वक समझाया कि इन्द्रिय-सुख तुच्छ और दुखमूल है; ऐसे सुख में लिप्त होना “उलटी को खा लेने” जैसा घृणित है—यह उनकी कठोर उपमा थी, जिससे वैराग्य जागे।
- यह सुनकर रथनेमी लज्जित हुए, पुनः तप में स्थिर हुए और आगे चलकर ज्ञान की उच्च अवस्थाएँ प्राप्त कीं। राजीमती स्वयं आजीवन सती-साध्वी रहकर श्रमणाचार में स्थित रहीं।
परंपरागत भेद
- श्वेतांबर वाङ्मय में यह प्रसंग राजुल-सती के आदर्श संयम और रथनेमी के सुधरने के रूप में आता है।
- दिगंबर परंपरा में भी सती की तीक्ष्ण उपमा से रथनेमी का मोक्षमार्ग की ओर उन्मुख होना वर्णित है; कई आख्यानों में आगे उनकी उच्च आध्यात्मिक सिद्धि का उल्लेख मिलता है।
सार: राजीमती ने तीक्ष्ण उपमा देकर रथनेमी को स्मरण कराया कि अस्थायी देह-सुख के लिए साधु-व्रत तोड़ना अत्यन्त अधम है; संयम ही कल्याण का मार्ग है।
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