राजीमती ने पुरुषोत्तम की उपमा
संक्षेप में समझें:
- जैन परंपरा में “राजीमती” (राजुल) प्रभु अरिष्टनेमि (नेमिनाथ) की व्रतनिष्ठ पत्नी‑समर्पिता नायिका हैं।
- वे अपने आराध्य अरिष्टनेमि को “पुरुषोत्तम” कहकर स्तुति करती हैं। यहाँ “पुरुषोत्तम” का अर्थ है – परम श्रेष्ठ पुरुष, अर्थात् तीर्थंकर जिनेश्वर।
उपमान (उपमा) का भाव
- विभिन्न चरितों/काव्यों में राजीमती द्वारा प्रभु की श्रेष्ठता बताने के लिए पारंपरिक उपमाएँ दी गई हैं, जैसे:
परंपरा-भेद
- दिगंबर परंपरा में यह भाव “हरिवंशपुराण” और नेमिनाथ‑चरित कथाओं में आता है।
- श्वेतांबर परंपरा में भी नेमिनाथ‑राजुल कथा के स्तुत्य पद्यों में यही अर्थ प्रसंगानुसार प्रकट होता है। शब्दावली/पद्य अलग हो सकते हैं, पर भाव एक ही रहता है: राजीमती ने प्रभु नेमिनाथ को “पुरुषोत्तम” कहकर सर्वोच्च बताया है।
यदि आप किसी विशेष ग्रंथ के सटीक पद/पंक्ति की मूल पाठ स्वरूप में चाहें, तो वही ग्रंथ‑नाम बताने पर उसी के अनुरूप शुद्ध पाठ और अर्थ दिया जा सकता है।