तेला करने का पचखान
तेला करने का पचक्खान (लोकाचार)
उद्देश्य तेल लगाते समय सूक्ष्म जीवों की हिंसा कम हो, आसक्ति न बढ़े, और क्रिया मर्यादा में रहे। इसलिए पहले संकल्प (पचक्खान) लिया जाता है।
संक्षिप्त पचक्खान (हिंदी) “मैं अरिहंत-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-साधु भगवान को नमस्कार करके आज दिनांक ______, स्थान ______ पर, ____ से ____ तक, केवल देह-स्वास्थ्य हेतु शुद्ध, छना हुआ तेल अल्प मात्र में प्रकाश में सावधानीपूर्वक लगाऊँगा/लगवाऊँगा। इस क्रिया में जीवों की रक्षा का यत्न करूँगा, आसक्ति नहीं करूँगा, सुगंधित/मद्य-मिश्रित तेल का प्रयोग नहीं करूँगा, अनावश्यक मलिश नहीं करूँगा। मिच्छामी दुक्कडं।”
(यदि समय अल्प हो तो) “शुद्ध, छना तेल प्रकाश में, अल्प मात्र, अहिंसा-भाव से केवल आरोग्य हेतु लगाऊँ—ऐसा मेरा पचक्खान है। मिच्छामी दुक्कडं।”
व्यवहार-सावधानियाँ
- दिन में, उजाले/प्रकाश में करें; रात में न करें।
- तेल चलनी/कपड़े से छना, कीट-रहित हो; सुगंध/रसायन-मिश्रित न हो।
- रूई/स्वच्छ कपड़े से हल्के हाथ लगाएँ; अनावश्यक मालिश न करें।
- फर्श/जल దగ్గर पर न बैठें; स्वच्छ आसन पर करें, गिरा तेल पोंछ दें।
- क्रिया पूरी होते ही हाथ अच्छी तरह धो लें; तिलचट्टे/कीट आकर्षण से बचाव रखें।
- यदि आरोग्य-आवश्यकता विशेष हो, तो उतनी ही मात्रा/समय का अपवाद संकल्प में स्पष्ट बोलें।
परम्परागत भेद
- श्वेतांबर परम्परा: उजाले में, छने तेल का अल्प उपयोग; समायिक/प्रतिमाधान के समय परहेज़।
- दिगंबर परम्परा: उजाले में, अल्प व आवश्यक मात्र; सुगंध/आलापन से बचें, संयमपूर्वक करें।
ध्यान दें यह पचक्खान लोकाचार-आधारित गृहस्थ-विधि है, कोई मूल आगमिक सूत्र नहीं। अपने गुरु/संघ में प्रचलित शब्दावली हो तो वही ग्रहण करें।
संबंधित संदर्भ