पच्चखान का सही मतलब
पच्चखान (प्राकृत: पच्चक्खाण, संस्कृत: प्रत्याख्यान) का सही मतलब है—सचेत “संकल्प” या “त्याग-व्रत” लेना। यानी आप स्पष्ट रूप से ठानते हैं कि एक निश्चित समय तक, निश्चित बातों से दूर रहेंगे।
मुख्य बातें
- क्या: किसी वस्तु/कर्म का त्याग करने का औपचारिक वचन (जैसे भोजन, पानी, रात्रि-भोजन, स्वाद, आदि)।
- कितने समय के लिए: तय अवधि बताई जाती है (जैसे आज/एक दिन/सूर्यास्त तक/परोसण तक)।
- क्यों: अहिंसा, संयम और आत्मशुद्धि के लिए; मन को अनुशासन में रखने हेतु।
- कैसे: गुरु-साधु के समक्ष, या तीर्थंकर प्रतिमा/धर्मग्रंथ के सामने, विनम्र भाव से संकल्प बोला जाता है।
- कब-कब: उपवास, अयम्बिल, एकासन, तिविहार/चौविहार, रात्रि-भोजन न करने आदि के पहले पच्चखान लिया जाता है।
परंपरागत भेद
- श्वेताम्बर परंपरा में “पच्चखान/पच्चक्क्खाण” शब्द प्रचलित है; दिगम्बर परंपरा में वही भाव “प्रत्याख्यान/संकल्प” के रूप में कहा जाता है। सिद्धांत एक ही है—समयबद्ध त्याग का स्पष्ट व्रत।
सरल उदाहरण
- “आज मैं सूर्यास्त के बाद अन्न‑जल नहीं लूँगा।” (तिविहार/चौविहार का पच्चखान)
- “आज मैं उपवास करूँगा—भोजन नहीं लूँगा; केवल उकाला हुआ जल मर्यादा में लूँगा।” (उपवास का पच्चखान)
- “आज मैं अयम्बिल करूँगा—एक बार निर्लेप, सादा भोजन लूँगा, स्वाद‑विलास का त्याग करूँगा।” (अयम्बिल का पच्चखान)
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