क्षमावाणी पर क्या करे
क्षमावाणी (क्षमा पर्व) पर क्या करें
सार भाव
- अपने से, वचन से और मन से हुई हर छोटी–बड़ी भूल के लिए सभी जीवों से हार्दिक क्षमा माँगना और सबको क्षमा कर देना। यही क्षमा धर्म का सार है।
दिनभर करने योग्य सरल क्रम 1) सुबह
- स्नान, शुद्धि, देव–गुरु–धर्म की वंदना।
- शांत बैठकर 10 धर्मों में “उत्तम क्षमा” का चिंतन: “क्रोध छोड़ूँ, सबको क्षमा करूँ, सब से क्षमा माँगूँ।”
- संभव हो तो उपवास/एकासन/बेसन (संयमपूर्वक) रखें।
2) स्वाध्याय और जप
- क्षमा से जुड़े पाठ: “क्षमापना” या यह प्राकृत वाक्य—
3) प्रायश्चित्त (आलोचना–प्रतिक्रमण)
- बीते वर्ष/समय की गलतियों को याद करके भीतर से स्वीकार करना (आलोचना), उनका परित्याग का संकल्प (प्रत्याख्यान) लेना, और संध्या का प्रतिक्रमण करना।
- जिनसे भूल हुई, उनके सामने विनम्रता से कहें: “मिच्छामि दुक्कडं/मिच्छामी दुक्कडम्” (मेरी गलती क्षमा करें)। मन से, संदेश से, या सीधे मिलकर—भाव निष्कपट हो।
4) दया और दान
- जीव दया: हिंसा से बचें, किसी को कष्ट न दें।
- संयमित दान: जैन गतिविधियों, गौशाला/पशु–पक्षी सेवा, ग्रंथ/स्वाध्याय सहायता, साधु–संघ के प्रति कृतज्ञता।
5) ध्यान–समाधि
- थोड़ी देर श्वास पर ध्यान, जप, या स्तोत्र पाठ से क्रोध–मान–माया–लोभ को शांत करना।
- दिन के अंत में फिर से सबके प्रति मैत्री और क्षमा का भाव दृढ़ करना।
परंपरागत विशेषताएँ
- श्वेतांबर परंपरा: पर्युषण के अंतिम दिन “सम्वत्सरी” पर सार्वत्रिक क्षमा-याचना होती है; मुख्य अनुष्ठान सम्वत्सरी प्रतिक्रमण और “मिच्छामि दुक्कडम्” कहना।
- दिगंबर परंपरा: दशलक्षण महापर्व में “उत्तम क्षमा” सहित 10 धर्मों का विशेष चिंतन; क्षमावाणी/क्षमा दिवस पर सबको क्षमा माँगना और देना। तिथि चंद्रमान के अनुसार पड़ती है; स्थान-समय के अनुसार भिन्न हो सकती है।
जीवन में उतारें
- आज सिर्फ शब्दों से नहीं, भीतर से अहंकार छोड़कर क्षमा माँगें।
- जिनसे मन खिन्न है, उनका नाम लेकर भीतर से क्षमा दें।
- आगे के लिए स्पष्ट संकल्प: क्रोध में उत्तर नहीं, असत्य नहीं, परनिंदा नहीं, अनावश्यक हिंसा नहीं।
यदि चाहें, क्षमा पर्व के मूल भाव और संक्षिप्त पाठ इसी तरह अपनाएँ:
- मैत्री: “सब जीव मेरे मित्र हैं।”
- प्रसन्नता: “सज्जनों में आनंद।”
- करुणा: “दुखियों पर करुणा।”
- मधyasthata: “दुर्वृत्तों से उदासीनता”—और अंत में “मिच्छामि दुक्कडम्।”
भवतु सर्वमंगलम्।