जैन मिलन में क्या पूजा करे
जैन मिलन (सामूहिक सभा/सत्संग) का उद्देश्य सम्यक् दर्शन–ज्ञान–चारित्र की भावना बढ़ाना है। इसलिए पूजा सरल, अहिंसक, शुद्ध और अनुशासनपूर्ण रखें। नीचे मिलन में अपनाने योग्य संक्षिप्त व पारंपरिक रूप दिए हैं:
1) सभी के लिए सामान्य, 30–45 मिनट का “मिलन-पूजा” क्रम
- मंगलाचरण: 9 या 27 बार नवकार मंत्र जप, फिर शांति पाठ।
- वंदना: पंच-परमेष्ठी वंदना, 2–5 मिनट कायोत्सर्ग (मौन ध्यान)।
- क्षमापना: संक्षिप्त आलोचना–प्रतिक्रमण भावना, “मिथ्यात्व-कषायादि दोषों से क्षमा” की प्रार्थना।
- स्तवन/स्तोत्र:
- अनुप्रेक्षा: क्षमा, मैत्री, अपरिग्रह, सम्यक भाव पर 3–5 मिनट चिंतन।
- समापन: सार्वभौम क्षमायाचना और मंगल पाठ।
2) प्रतिमा/जिनालय उपलब्ध हो तो
- दिगंबर परंपरा
- श्वेतांबर (मूर्तिपूजक) परंपरा
3) प्रतिमा उपलब्ध न हो तो (भाव-पूजा/स्वाध्याय केंद्र में)
- सामायिक: 12–24 मिनट शुद्ध भाव से।
- नवकार जप, लोगस्स/उवसग्गहरं, शांति स्तोत्र।
- जैन सिद्धांत पर छोटा स्वाध्याय/प्रवचन (अहिंसा, संयम, अनुप्रेक्षा)।
- अंत में सभी से पारस्परिक क्षमा-याचना।
4) समय कम हो तो 10–12 मिनट का “त्वरित क्रम”
- 9 बार नवकार, 2 मिनट कायोत्सर्ग।
- लोगस्स या उवसग्गहरं की कुछ गाथाएँ।
- शांति पाठ और क्षमायाचना।
5) आचार-संयम के कुछ ध्यानयोग्य बिंदु
- शुद्धता: पूजा-द्रव्य शाकाहारी, अहिंसक, ताजा व स्वच्छ हों; अपव्यय न करें।
- रात्रि में अभिषेक/जल-कार्य से बचें; आरती/स्तवन कर सकते हैं।
- मौन, अनुशासन, मोबाइल शांति; आसन पर स्थिर बैठकर भक्ति।
- प्रसाद/नैवेद्य भोग नहीं, केवल प्रतीकात्मक अर्पण; उपरांत सत्कार में सादगी और संयम।
दिगंबर/श्वेतांबर परंपराओं में नाम/रीतियों में भिन्नता हो सकती है, पर मूल भाव एक ही है: राग-द्वेष का क्षय, सम्यक् भावों की वृद्धि और पंच-परमेष्ठी की भक्ति।
यदि आप अपने स्थानीय मिलन के अनुसार विस्तृत क्रम-पत्रक चाहते हैं (जैसे अष्ट-द्रव्य/अष्ट-प्रकारी पूजा की संक्षिप्त विधि, लोगस्स/उवसग्गहरं के पाठ), तो उसी अनुसार उपर्युक्त ढांचे में रखिए—पूजा संक्षिप्त, शुद्ध और भावपूर्ण हो, यही सार है।