भगवती आराधना या ग्रंथात प्रमादी आत्म्याला अहिंसक म्हटले आहे चूक की बरोबर
गलत.
भवगती आराधना (दिगम्बर परम्परा का ग्रंथ) में “प्रमाद” को हिंसा का मुख्य कारण माना गया है। जो आत्मा प्रमादी (असावधान, आलस्य/उदासीनता से घिरी) है, वह भीतर से राग‑द्वेष को बढ़ाती है और इससे हिंसा अवश्य होती है। इसलिए प्रमादी आत्मा को “अहिंसक” नहीं कहा जा सकता। सच्ची अहिंसा तभी संभव है जब आत्मा “अप्रमत्त” रहकर समिति‑गुप्ति और संयम का पालन करे।
परम्परा-भेद:
- दिगम्बर और श्वेताम्बर—दोनों में सिद्धान्त यही है कि अहिंसा के लिए “अप्रमाद” (सावधानी/जागृति) अनिवार्य है; प्रमाद को व्रतों की उलंघना और हिंसा का द्वार कहा गया है।