Akshat puja karke sadhgati pane wale
Akshat pūjā karke sadgati pāne wale
Arth (mahatva)
- Akshat (कच्चा, अखण्ड चावल) “akṣaya/akṣata” का संकेत है—ऐसा पुण्य-भाव जो क्षीण न हो। इसका संकेत यह भी है कि यह जीवन अन्तिम (परमगति की ओर ले जाने वाला) बने। शुद्ध भाव से की गई Akshat pūjā सम्यक् दर्शन–ज्ञान–चारित्र को पुष्ट करके पुण्य बांधती है, जिससे देव या मनुष्य sadgati मिलती है और अन्ततः मोक्ष-पथ में प्रगति होती है.
Sadgati कैसे मिलती है
- केवल द्रव्य चढ़ाने से नहीं—शुद्ध, अहिंसक, राग-द्वेष-रहित भाव से चढ़ाने से पुण्य बनता है।
- जिनेन्द्र की प्रतिमा के समक्ष निरहंकार, निरममत्व का चिन्तन और “यह जीवन अन्तिम बने” यह संकल्प—यही Akshat का सच्चा अर्थ है।
- इस भाव से की गई pūjā पापकर्मों की निर्जरा में सहायक बनती है और भावि जन्म उत्तम होता है; लक्ष्य मोक्ष ही है।
सरल विधि (Ashtaprakārī pūjā में Akshat) 1) स्नान–शुद्धि के बाद Namokār mantra का जप कीजिए। 2) जल और चन्दन के पश्चात् स्वच्छ, अखण्ड चावल हाथ में लें। 3) आंखें आधी बन्द कर जिनेन्द्र का स्मरण करें और विनयपूर्वक अर्पण करें: “Om Arham akṣatam samarpayāmi.” 4) मन में संकल्प: “राग-द्वेष क्षीण हों, यह जीवन अन्तिम बने, सब जीवों का कल्याण हो।”
ध्यान रखने योग्य
- अहिंसा: टूटा-फूटा (भंग) चावल न लें; अनावश्यक अपव्यय न करें।
- स्वच्छता: धुले हाथ, स्वच्छ पाट/वेदी; अर्पित द्रव्य पैरों के समीप/आसन पर रखें, बिखराएँ नहीं।
- भाव: किसी सिद्धि/सांसारिक लाभ की इच्छा से नहीं—केवल आत्म-शुद्धि और व्रत-संकल्प के भाव से।
परम्परा के अनुसार
- Shvetāmbara Mūrtipūjak: Ashtaprakārī pūjā में जल–चन्दन के बाद Akshat वेदी/चरण-भाग के पास अर्पित करते हैं।
- Digambara: अभिषेक के पश्चात् Akshat सामान्यतः वेदी/आसन पर अर्पित होते हैं; प्रतिमा के शरीर पर चावल चिपकाने की प्रथा नहीं रहती।
- Sthānakvāsi/Terāpanth: प्रतिमापूजा नहीं, अतः Akshat pūjā का व्यवहार नहीं; ध्यान–प्रार्थना प्रधान।
सार