Dashvaikalika sutr mai grahsth ke patr mai bhojan karne se kaunsa anachar lagta hai ???
दशवैकालिक सूत्र के नियमों के अनुसार गृहस्थ के “उपयोग किए हुए थाली/पात्र” में भोजन स्वीकार करना “पात्र-अनाचार” (Patra-anāchār) माना जाता है। इसे “उच्छिष्ट-भोजन” या “परिभुक्त-पात्र-ग्रहण” का दोष भी कहा जाता है। अर्थ यह कि साधु को केवल शुद्ध, अनउपयोगित (नव) पात्र में ही आहार लेना चाहिए; गृहस्थ के खाए हुए पात्र में लेना अनुचित है — यह आहार-संबंधी अनाचार है।
परंपरा-भेद:
- श्वेतांबर परंपरा: दशवैकालिक सूत्र में “पात्र-शुद्धि” के नियम के अंतर्गत इसे स्पष्ट रूप से अनाचार माना गया है।
- दिगंबर परंपरा: मूलाचार आदि में “उच्छिष्ट-भोजन”/“आहार-दोष” रूप में यही निषेध है। दोनों परंपराएँ इसे दोष ही मानती हैं; नामावली में थोड़ा अंतर हो सकता है, अर्थ एक ही है।
इसका सार यही है कि गृहस्थ के खाए हुए पात्र में साधु का भोजन लेना “पात्र-अनाचार” है और त्याज्य है।