तप के अतिचार
जैन धर्म में “तप के अतिचार” का अर्थ है—तप (उपवास आदि) करते समय होने वाली वे गलत मनोभावनाएँ जिनसे तप की शुद्धि नष्ट होती है। परम्परा से इनके पाँच प्रकार बताए गए हैं (प्राकृत पदों सहित):
1) इहलोग-संसप्पऊगए अर्थ: इस लोक में मान‑प्रतिष्ठा, धन, सिद्धि आदि पाने की इच्छा से तप करना।
2) परलोग-संसप्पऊगए अर्थ: स्वर्ग, इन्द्रादि सुखों की चाह से तप करना।
3) जीविया-संसप्पऊगए अर्थ: अपनी महिमा/प्रशंसा देखते हुए अधिक समय तक जीने की इच्छा से तप करना।
4) मरणा-संसप्पऊगए अर्थ: कष्ट से भागने या असफलता के भय से शीघ्र मरने की इच्छा से तप करना।
5) कामभोग‑संसप्पऊगए अर्थ: इन्द्रिय‑भोग, काम‑सुख आदि की प्राप्ति की लालसा से तप करना।
मर्म: तप केवल कषाय‑क्षय और आत्म‑शुद्धि के लिए, निष्काम भाव से किया जाए; फल‑लालसा या दिखावे से किया गया तप अतिचार बनता है।
परम्परागत भेद:
- दिगम्बर व श्वेताम्बर—दोनों परम्पराओं में पाँच अतिचार स्वीकार हैं; कहीं‑कहीं तीसरे‑चौथे की भाषा “दीर्घजीवन की इच्छा/शीघ्रमरण की इच्छा” रूप में आती है, पर आशय वही है कि इच्छा‑प्रेरित तप दोष है।
सार: इच्छा-रहित, समता‑पूर्वक, ज्ञान‑दर्शन‑चारित्र की वृद्धि हेतु किया गया तप ही शुद्ध तप है; अन्यथा वह “तप का अतिचार” माना जाता है।
अधिक पढ़ें: तप के रूप, आयम्बिल/वर्षीतप आदि पर सरल सामग्री यहाँ देखें: • अतिचार का सरल विवरण: