एक राशि / एक तत्त्व
“एक राशि / एक तत्त्व” को जैन दृष्टि से इस प्रकार समझें:
1) “एकत्व” (एक‑तत्त्व नय)
- निष्चय नय से आत्मा का एक ही तत्त्व है—शुद्ध उपयोग (शुद्ध ज्ञान‑दर्शन). यही “एक तत्त्व” कहा जाता है। इसका अर्थ: आत्मा का स्वभाव एकरूप, चेतन और शुद्ध है; बाकी सब (कर्म, देह, इन्द्रियाँ, सुख‑दुःख) पराया है।
- दिगम्बर परंपरा में आचार्य कुन्दकुन्द (समयसार आदि) “एक‑तत्त्व” को विशेष रूप से शुद्धोपयोग के रूप में प्रतिपादित करते हैं।
- श्वेताम्बर परंपरा में व्यवहार नय से सात/नौ तत्त्वों (जीव, अजैव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा, मोक्ष; और कभी पुण्य‑पाप) का वर्णन प्रमुख है; परन्तु निष्चय नय से आत्मा का तत्त्व अंततः शुद्ध चेतना ही माना जाता है। इस प्रकार दोनों परंपराएँ नयों के भेद से एक ही सत्य की ओर संकेत करती हैं: अन्ततः आत्मा का सार एक—शुद्ध चेतना।
2) “एकत्व भावना”
- बारह भावनाओं में “एकत्व” का तात्पर्य: मैं जन्म‑मरण, सुख‑दुःख, कर्म‑फल का भोक्ता—सबमें अकेला हूँ; कोई संबंधी मेरे साथ जन्मता‑मरता नहीं। इससे वैराग्य, निर्भरता‑त्याग और आत्म‑निर्भर साधना जागृत होती है।
- “अन्यत्व” (परत्व) भावना इसकी पूरक है—देह, पदार्थ, सम्बन्ध, कर्म आदि आत्मा से अन्य हैं। दोनों मिलकर साधक को “एक तत्त्व” (आत्म‑स्वभाव) में स्थिर करती हैं।
3) “एक‑रस” (एकरस/एकराशि) का संकेत
- जब कहा जाता है कि आत्मा “एकरस” है, उसका अर्थ है—आत्मा का स्वभाव (चैतन्य) सर्वत्र समान और अखण्ड है; उसमें पर‑पदार्थ के भेद‑विकार स्वाभाविक रूप से नहीं हैं। यह “एक‑तत्त्व” की ही गूंज है—आत्मा का सार एक, अखण्ड और शुद्ध।
सरल सार
- व्यवहार से तत्त्व कई (७/९) बताए जाते हैं ताकि साधना का क्रम स्पष्ट हो।
- निष्चय से आत्मा का सार एक तत्त्व—शुद्ध चेतना (शुद्धोपयोग) है; उसी में स्थित होना ही वास्तविक साधना है।
- “एकत्व भावना” इसी एक तत्त्व में स्थिर होने की साधना है।