Dashvaikalika sutr mai पापकरी आचरण एवं कल्याणकारी आचरण को किस प्रकार से जाना जाता है ????
दशवैकालिक सूत्र के अनुसार आचरण को पहचानने का सरल मापदण्ड यह है:
- जो राग‑द्वेष से प्रेरित हो, जिससे अपने‑पराए को क्लेश/हिंसा पहुँचे, संयम ढीला पड़े और साधना में प्रमाद बढ़े—वह पापकरी आचरण है (पाप).
- जो राग‑द्वेष को घटाए, किसी प्राणी को हानि न दे, आत्मसंयम को दृढ़ करे और साधना में उन्नति करे—वह कल्याणकारी आचरण है (पुण्य).
इसे परखने के व्यावहारिक सूत्र:
- पंचमहाव्रतों (अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) के विपरीत चलना पापकरी; इनके अनुरूप चलना कल्याणकारी.
- त्रिगुप्ति (मन‑वचन‑काय की रक्षा) और पंचसमिति (इर्या/चलना, भाषा/बोलना, एषण/भोजन‑भिक्षा, आदान‑निक्षेप/वस्तु‑उपयोग, उत्सर्ग/शौच) के विरुद्ध आचरण पापकरी; इन्हीं के अनुसार सावधानीपूर्वक आचरण कल्याणकारी.
- परिणाम (भाव) ही मूल है: हिंसा‑भाव, कपट, लोभ, क्रोध, मान आदि के उद्रेक को बढ़ाने वाला आचरण पापकरी; सम्यक्दर्शन‑ज्ञान‑चारित्र को पुष्ट करने वाला आचरण कल्याणकारी.
परंपरागत भेद:
- श्वेताम्बर परंपरा में यह सीधे दशवैकालिक सूत्र की साधु‑आचार शिक्षाओं में प्रतिपादित है।
- दिगम्बर परंपरा में यही कसौटी मूलाचार, भागवती आराधना आदि ग्रंथों में इसी भाव से समझाई गई है—अर्थ एक ही है: अहिंसा‑संयम की रक्षा कल्याण, और उसका उल्लंघन पाप।