प्रमाण से अधिक आहार करना
“प्रमाण से अधिक आहार करना” जैन धर्म में संयम-विरुद्ध माना गया है। यह मिताहार (संयमित भोजन) और “परिमाण” (मात्रा-सीमा) के सिद्धांत के विपरीत है, तथा “उनोदरी” (क्षुधा से कम खाना) की साधना को बाधित करता है।
क्यों गलत है
- शरीर में आलस्य, रोग और प्रमाद बढ़ाता है।
- तृष्णा और आसक्ति (परिग्रह) को बढ़ाकर मोहनीय कर्म बाँधता है।
- अधिक उपभोग से अप्रत्यक्ष हिंसा भी बढ़ती है (अधिक संसाधन/पदार्थ लगते हैं)।
जैन दृष्टि से सही अभ्यास
- मात्रा-परिमाण: भोजन शुरू करने से पहले निश्चित भाग तय करें; दोबारा न लें।
- रस-परिमाण: व्यंजनों की संख्या/विविधता सीमित रखें।
- समय-परिमाण: नित्य निश्चित समय पर ही खाएँ; गृहस्थ के लिए रात्रि-भोजन वर्जन श्रेष्ठ माना गया है।
- उब्जोग-सम्यक: सजगता से, शांत मन से, बिना विचलन के खाएँ।
- उनोदरी: तृप्ति से थोड़ा कम—पेट को हल्का रखने की आदत।
- नियत मर्यादा-व्रत: भोग-उपभोग में सीमा रखना (गृहस्थ के अनुव्रतों का भाव)।
संक्षेप में, जैन साधना में “कम, स्वच्छ, संयमित” भोजन—यही आरोग्य और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है।