समकित धर्म रूपी माल की है
“समकित” का अर्थ है सम्यक्-दर्शन — अर्थात् सत्य तत्त्वों (जीव, अजीव, आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध, मोक्ष) में अटल श्रद्धा। “समकित धर्म रूपी माल की है” पंक्ति कवित्वपूर्ण ढंग से कहती है कि सम्यक्-दर्शन आत्मा की गले की माला है—जिसके प्रत्येक मनके जैसे गुण हैं: अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, क्षमा, करुणा इत्यादि। यह माला आत्मा को शोभित भी करती है और रक्षा भी करती है।
मुख्य बातें (परंपरागत जैन अर्थ)
- सम्यक्-दर्शन मोक्ष-पथ का द्वार है; इसके बिना सम्यक्-ज्ञान और सम्यक्-चरित्र सिद्ध नहीं होते।
- सम्यक्-दर्शन के आठ लक्षण (दोनों—दिगंबर और श्वेतांबर—परंपराओं में मान्य)
- कर्म-दृष्टि से यह मिथ्यात्व मोहनीय कर्म के क्षयोपशम से उदित होता है; यही आगे सम्यक्-ज्ञान व सम्यक्-चारित्र का आधार बनता है।
संक्षेप में, “समकित” वह आभूषण है जो आत्मा को भीतर से सजाता है—ज्ञान को निर्मल, चरित्र को दृढ़ और मोक्ष-पथ को स्पष्ट करता है।