ओत्पातिकी बुद्धि के उदाहरण
जैन दर्शन में “औत्पात्तिकी बुद्धि” उस बुद्धि (समझ) को कहते हैं जो बिना पहले देखे, सुने या सीखे किसी वस्तु/विषय का सही-सही, तुरन्त और निष्कलंक ग्रहण कर लेती है। यह स्वतः उत्पन्न होने वाली, अबाधित फलयुक्त बुद्धि मानी गई है। जैन आगम-परंपरा में बुद्धि के चार भेद बताए गए हैं—औत्पात्तिकी, वैनयिकी, कर्मजा और परिणामिकी—जिनमें यह प्रथम है। ( jainqq.org)
औत्पात्तिकी बुद्धि के सरल उदाहरण
- कोई बालक पहली ही बार किसी लिपि/भाषा को देखकर बिना सिखाए शब्दों का आशय ठीक-ठीक समझ ले।
- किसी शिष्य को शास्त्र का कोई गूढ़ सूत्र पहली बार सुनते ही उसका सार-arth स्पष्ट और यथार्थ रूप से समझ आ जाए।
- किसी जटिल यंत्र/रचना को पहली निगाह में देखकर उसकी कार्य-प्रणाली का सही ज्ञान हो जाए, जबकि पहले कभी उसका अभ्यास न किया हो।
- अपरिचित मार्ग पर पहुँचे व्यक्ति को बिना पूछे-सिखे दिशा-बोध हो जाए और वह सीधा सही स्थान तक पहुँच जाए।
- किसी समस्या को पहली बार देखते ही उसके समाधान का यथार्थ तरीका मन में स्वतः उभर आए, जबकि पहले ऐसा अनुभव न रहा हो।
- किसी चित्र/आकृति के प्रतीकों का अर्थ पहली दृष्टि में ही ठीक-ठीक समझ में आ जाए, बिना पूर्व अध्ययन के।
परंपरागत टिप्पणी
- श्वेतांबर और दिगंबर—दोनों परंपराएँ बुद्धि के इन चार भेदों (औत्पात्तिकी, वैनयिकी, कर्मजा, परिणामिकी) को स्वीकार करती हैं; मूल आशय एक ही बताया गया है। औत्पात्तिकी का अर्थ यहां “स्वतः, अकस्मात् और बिना पूर्वाभ्यास के उपजी हुई शुद्ध-बुद्धि” है। ( jainqq.org)
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