Tirthankar Parmatma ka ek prakar ka vishesan
“Tirthankar Parmatma” का एक प्रमुख विशेषण: “वितराग”.
अर्थ: जिनमें राग‑द्वेष पूर्णतः क्षीण हो गए हों, सभी कषाय शांत हों, और जो केवल ज्ञान से युक्त हों—उन्हें “वितराग” कहा जाता है। यही तत्त्व Tirthankar Bhagwan का सार है: न किसी से आसक्ति, न किसी से द्वेष; केवल करुणा और सम्यक उपदेश।
Digambar और Shwetambar—दोनों परम्पराओं में “वितराग” का यही अर्थ स्वीकार है।