तीर्थंकर क्षत्रिय होते थे। तो क्या मांसाहारी परिवार से होते थे
संक्षेप में: नहीं।
जैन परंपरा के अनुसार सभी तीर्थंकर क्षत्रिय कुल में जन्मे, लेकिन उनके माता‑पिता और परिवार अहिंसा-प्रधान, धर्मनिष्ठ और शाकाहारी बताए गए हैं। क्षत्रिय होना केवल वंश/राजधर्म का परिचय है; यह मांसाहार से जुड़ा अनिवार्य नियम नहीं है। जैन आगमों और पुराणों में तीर्थंकरों के गृहस्थ जीवन का वर्णन करते हुए अहिंसा, दया और शुद्ध (निरिह) आहार पर ही जोर मिलता है—मांसाहार का नहीं।
- श्वेतांबर परंपरा (जैसे कल्पसूत्र आदि) और दिगंबर परंपरा (जैसे आदिपुराण आदि) — दोनों में सिद्धांत एक ही है कि तीर्थंकरों के कुल में अहिंसा और शुद्ध शाकाहार का पालन होता है।
- गर्भावस्था से लेकर राज्य-जीवन तक, उनकी माताएँ और परिवार सात्त्विक, प्राणी‑हिंसा रहित आहार का ही पालन करते हैं; यही उनके आगे चलकर संपूर्ण अहिंसा‑धर्म के प्रवर्तक बनने की भूमिकाओं से भी मेल खाता है।
इसलिए “क्षत्रिय थे, तो क्या मांसाहारी परिवार से थे?”—जैन मत में इसका उत्तर स्पष्ट रूप से “नहीं” है; तीर्थंकरों के परिवार शाकाहारी और अहिंसक माने गए हैं।