Tirthankar ko konse dosh nhi lagte
संक्षेप में: तीर्थंकरों को कोई दोष नहीं लगता (न ही वे दोषपूर्ण कल्पनाओं में फँसते हैं). वे पूर्ण शुद्ध आत्मा होते हैं और उनके भीतर सभी प्रकार के दुष्ट गुण (कठिन कामनाएँ) नहीं रहते।
मुख्य दोष जो तीर्थंकरों में नहीं होते:
- क्रोध (क扣) और अन्य हिंसा से जुड़ा झगड़ा
- ममता/अहंकार (आत्म-गौरव) आदि
- छल-धन्धा (कपट, मिथ्या बोलना)
- लोभ-लाभ, मोह, अहंकार
- अन्य गलत विचारों और अविकारों से पूर्ण दूरी
तीर्थंकर परंपरागत रूप से अहिंसा, सत्य, अछरेपन (अस्तेय), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे नैतिक गुणों के पूर्ण पालन करते हैं. वे अलग-अलग संप्रदायों (दिगंबर, श्वेतांबर) में कुछ व्याक्या-व्यवहार के अनुसार भिन्न अर्थ पा सकते हैं, पर उनके मूल में सभी दोषों से पूर्ण दूरी ही मानी जाती है.
यदि आप चाहें, मैं आपके लिए इस विषय पर संस्कृत/प्रमाणिक शास्त्रों के अनुरूप सरल अरथ (गैर-आलोचनात्मक, Jain-dharma के अनुरूप) में और स्पष्ट कर सकता हूँ.