Teen Prakar ki Puja
जैन धर्म में “तीन प्रकार की पूजा” अक्सर इस तरह समझी जाती है:
1) जंय/संस्थापक की पूजा (ईश्वर-पूजा नहीं, बल्कि जैन तीर्थंकरों का पूर्ण सम्मान): नित्य-नमस्कार, नमाकर पाठ, फल-फूल आदि श्रृंगार-समर्पण के साथ तीर्थंकरों की महिमा का स्मरण करना।
2) आचार्य-गुरु पूजा: सम्वत्सरी-चैत्य-भक्ति के साथ गुरुदेव या आचार्यों का सम्मान और उपस्थिति-पूजा, उनकी शिक्षाओं का पठन-पाठन करना।
3) साधक-समुदाय की पूजा (परमपवित्र संघ/सद्गुरु के प्रति श्रद्धा): संघ के सदस्यों, साधुओं के लिए आशीर्वाद-प्रार्थना, भक्ति-कल्याण के लिए दान-सेवा आदि।
महत्वपूर्ण बातें:
- इन तीनों प्रकारों में उद्देश्य समान है: शुद्ध जन्म-त्याग (मोक्ष) की दिशा में श्रद्धा, भक्तिपूर्ण स्मरण और नैतिक आचरण का संवर्धन।
- अलग-अलग परंपराओं में शब्द-भिन्नता हो सकती है: दिगंबर बनाम श्वेताम्बर परंपराओं में पूजा के क्रम या पाठ में हल्का-फुल्का अन्तर हो सकता है।
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