Vah koun th jo har samay dhyaan main leen rehte th aur pinjre main tota dekhkar jagat ko mithya maana
यह सवाल Jain धर्म में एक आदर्श अवस्था का चित्रण है। जो व्यक्ति लगभग हर समय ध्यान (ध्यान-योग) में लगा रहता है और संसार (जगत) को असत्य/मिथ्या मान लेता है, वह केवल ज्ञान प्राप्त Arhat/Keval-jnani की स्थिति का वर्णन करता है।
- कौन है वह व्यक्ति: यह एक "केवल-ज्ञानी" या arhat (केवल-ज्ञानी, जो अविद्या को पार करके सर्वज्ञता प्राप्त कर लेता है) की स्थिति है। ऐसे ऋषि/आचार्य नियमित ध्यान में रहकर संसार की साधारण पहचानों, कामना और बंधनों से ऊपर उठते हैं और उन्हें संसार व्यर्थ प्रतीत होता है।
- 의미 (arth) धार्मिक परिप्रेक्ष्य से: संसार आने-जाने, सुख-दुख, मोह-लाभ आदि निम्न स्थायित्व के कारण मिथ्या माना जाता है; केवल ज्ञान के स्तर पर आत्मा के शुद्ध, स्थायी स्वरूप की अनुभूति होती है। यह वैराग्य, समान्त, और निःसत्त्वता का निरंतर अनुभव है।
- दृढ़ता और परिशुद्धता: यह स्थिति शुद्ध दिक्षा/ध्यान, कैवल्य-ज्ञान और तात्पर्य से आत्म-प्रकाशन का परिणाम है; इसे Digambar और Shwetambar दोनों परंपराओं में आचार-उद्धरणों के साथ वे संगत मानते हैं—यानी ultimately Arhat/Keval-jnani वही है जिनके लिए संसार वास्तविक नहीं रहता।
- किसी एक कथा/उद्धारण से जुड़ी recognized व्याख्या: यह एक आदर्श स्थिति है जो साधु के जीव-गुण, वैराग्य और ज्ञान के समन्वय को दर्शाती है।
संक्षेप में: जो व्यक्ति हर क्षण ध्यान में लीन रहता है और जगत को मिथ्या मानता है, वह परमात्मा के ज्ञान (केवल-ज्ञान) को प्राप्त एक arhat/keval-jnani की स्थिति को दर्शाता है—यही Jain धर्म में उच्चतम मोक्षमार्ग की भूमिका है।