Vo ahimsa ka avtaar th sab jeevo se unhe pyaar th koun th ve moksh gaami jinpar tejo leshya ka hua prahaar th
यह सवाल Jain Dharma के मूल तत्वों से जुड़ा है। नीचे सरल शब्दों में स्पष्ट किया गया है:
- अहिंसा परमधर्म है: Jainism में अहिंसा (हिंसा से बचना) सर्वोच्च धर्म मानी जाती है। जो भी सही रास्ते पर चलते हैं, वे सभी जीवों से प्यार और करूणा रखते हैं।
- सभी जैन तीर्थंकर और आचार्य अहिंसा का उदाहरण होते हैं: हर तीर्थंकर ने जीवों के प्रति दया और अहिंसा के उच्च आचरण को jiwan भर के लिए दिखाया है। खासकर तीर्थंकर महावीर, जो इस वक्त के सबसे प्रमुख अहिंसात्मक आदर्श माने जाते हैं, परंपरा में उसे अहिंसा को चरम निष्कर्ष तक ले जाने वाला माना गया है।
- moksha gaami जिव: “मोक्ष गामी” का अर्थ है वे जैन जीव जो मार्ग पर चलकर मोक्ष प्राप्त करते हैं। अरहंत/आचार्य/तीर्थंकर सभी मोक्ष की ओर अग्रसर रहते हैं; वास्तव में मोक्ष तभी संभव है जब सभी प्रकार के कषाय और कर्म Jain रास्ते से समाप्त हो जाएँ।
- तेज-लेश्या (Tejo-leśya): यह वह आभा या रंग है जो किसी जीव के कर्मों के परिणामस्वरूप उसकी आंतरिक स्थितियों को दर्शाता है। तेज़-लेश्या के रंगों के बारे में बतौर संकेत मान्य मान्यताओं में है—जिनके कर्म शुद्ध होते हैं, उनका तेज उज्जवल होता है; दूषित कर्म वाले व्यक्ति का लेश्या धुँधला/मलिन माना जाता है। कुल मिलाकर, यह आभा बताती है कि किसी जीव के भीतर क्या गुण और कर्म हैं, न कि वह हिंसा का प्रत्यक्ष समर्थन करता है या नहीं।
- “Avatar of ahimsa” की वैचारिक व्याख्या: Jain Tradition में अहिंसा का पूर्ण रूप से ध्वजवाहक एक “अवतार” के रूप में नहीं कहा जाता; बल्कि हर तीर्थंकर और आचार्य अहिंसा को अपने जीवन से प्रतीक बनाते हैं। Digambar और Shwetambar मतों के बीच कुछ विवरणों में भिन्नताएँ मिलती हैं, लेकिन दोनों में अहिंसा सर्वोच्च धर्म है और महावीर को इस धर्म का प्रमुख वाहक माना जाता है।
यदि आप चाहें, मैं उस स्पष्ट सन्दर्भ के लिए पवित्र जैन् ग्रंथों में से संबंधित sutra-stotra का मूल पाठ (अगर माँगा जाए) और उसका सही arth (स्पष्ट अर्थ) दे सकता हूँ, साथ में Digambar बनाम Shwetambar दृष्टिकोण भी बताऊँगा।