Who isn’t allowed to do pratikraman? What conditions prevent a person from doing pratikraman? Why?
संक्षेप में: प्रातिक्रमन (प्रतिकर्मण) जैन धर्म का एक मन-आचरण है जो श्रद्धालु अपने पाप-उत्पत्ति और गलतियों के लिए क्षमा मांगने के लिए करते हैं। सामान्य रूप से यह सभी जैनों के लिए खुला है, पर कुछ बातें स्पष्ट हैं।
- कौन नहीं कर सकता/सकती: गैर-जैन व्यक्ति या जैन धर्मानुसार जीवन-मार्ग न मानने वाले लोग प्रातिक्रमन नहीं करते; यह एक जैन-दर्शन-आचरण है। वही, बच्चे या युवा जिनकी उम्र से यह अभ्यास सम्भव हो सके, वे भी कर सकते हैं—यानी आयु पर कोई कठोर निषेध नहीं है। प्रमुख बात यह है कि यह आचार-धर्म के भीतर रहने वालों के लिए है।
- किन परिस्थितियों में रोका जा सकता है: अगर व्यक्ति बहुत बीमार है, अत्यधिक दुर्बल है, या शारीरिक/आवेगपूर्ण स्थिति में है कि न तो बताई गई प्रार्थनाओं को सही से पढ़ सके और न मन से सम्हाल सके, तो उसे प्रातिक्रमन को स्थगित करना या बाद में छोटा-सा-छोटा रूप करना सही माना जाता है। अधिक असुविधाजनक समय में यदि पूरा प्रातिक्रमन संभव न हो, तब मन से ही क्षमा मांगना या नित्य-प्रतिक्रिया का संक्षिप्त रूप अपनाना भी स्वीकृत मानी जाती है। अलग-अलग संप्रदाय (दिगंबर,श्वेताम्बर) में नियत-प्रकार के अंतर हो सकते हैं, पर सामान्य भावना यही रहती है कि आवश्यकता पड़ने पर अनुष्ठान को संक्षेप या विराम दें।
- क्यों ये नियम हैं: प्रातिक्रमन का उद्देश्य छल-चालना-गलतियां मानना और आत्म-चिन्तन से पुण्य-गुणों को पुनःस्थापित करना है। बीमारी, कमजोरी या असमर्थता जैसी स्थिति में पूर्ण रूप से अनुष्ठान करना संभव न हो, तब भी मनोयोग से क्षमा-याचना का भाव बनाए रखने की अनुमति दी जाती है ताकि आत्मिक शुद्धि का अभ्यास जारी रहे।
अगर आप चाहें, मैं इस विषय से जुड़ी सुत्तों/शास्त्रीय अभिधारणाओं के अनुसार सरल artha विस्तार से बता दूँ— Digambar बनाम Shwetambar के विशिष्ट पक्ष भी समझा दूँगा।