स्वभाव से कौन सा समयकदर्शन होता है
संक्षिप्त में उत्तर: स्वभाव के हिसाब से समय के बारे में जैन दर्शन यह बताता है कि समय एक विराट, अपरिमाणीय चक्र है (युग-चक्र जो ब्रह्मांड के संचलन के साथ चलता है)। जीव-आत्मा इस समय-चक्र के भीतर ही अनुभव करता है—पिछला समय, वर्तमान और भविष्य ये तीनों मानसिक विचार हैं जो जाग्रत चित्त के द्वारा बनते हैं। इसलिए उम्मीदवार जवाब यही है:
- मूलतः समय के बारे में जैन सिद्धांत में स्पष्ट रूप से “Present moment” (वर्तमान समय) को व्यवहारिक तौर पर महत्त्व दिया गया है, क्योंकि सम-वोजन (समय) के बारे में ज्ञान की साधना और आत्म-सुधार के लिए वर्तमान क्षण पर स्थिर ध्यान देना महत्वपूर्ण होता है।
- जब मोक्ष प्राप्त हो जाता है, तब जीव आत्मा समय-परिमाण और इतिहास-युग के मिथ्या विचार से ऊपर उठ고, भीतर के निर्विकल्प स्थित में पहुँचता है।
- फिर भी, दिगंबर और श्वेतांबर परंपराओं के बीच समय के स्वरूप, युग-चक्र और काल-गणना के व्यावहारिक विवरणों में कभी-कभी भिन्नार्थक व्याख्याएं मिलती हैं।
यदि आप चाहें, मैं इस विषय को दिगंबर बनाम श्वेतांबर विस्तार के साथ सरल शब्दों में अलग-अलग दृष्टिकोणों के साथ समझा दूँ।