खाना महावीर स्वामी
महावीर स्वामी (जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर) ने अहिंसा और तपस्या को जीवन का कर्तव्य बनाया था। उनके भोजन के बारे में साधनों में सामान्य तौर पर यह कहा जाता है:
- भिक्षा पर निर्भर रहने वाले आचार-व्यवहार के कारण उनका भोजन सीधे-सीधे समाज से प्राप्त भिक्षा से ही होता था; वे जो कुछ भी लेते थे, उसे अणीय (अहिंसात्मक) और सरल रखा गया।
- मांस-मत्स्य आदि अवश्य खForbidden थे; वे केवल शाकाहारी भोजन ही ग्रहण करते थे।
- मॉनकों के जन्म-आचार के अनुसार_root vegetables_ (जड़ें) जैसे प्याज-लहसुन-आदि से परहेज और अन्न-फल-सीमित शाकाहारी आहार की परंपरा रही है; इसका उद्देश्य हिंसा के प्रत्येक रूप को कम से कम रखना है।
- कठिन तप और उपवास (उपवास, निशीद्री) उनके जीवन का हिस्सा थे; भिक्षाटन के साथ-साथ समय-समय पर कड़ा तप भी करते थे।
संक्षेप में: महावीर स्वामी का आहार अहिंसात्मक, शाकाहारी और भिक्षा पर निर्भर रहने वाला था; उनका मुख्य उद्देश्य अस्ति-जीवियों को चोट पहुँचाने से बचना और आत्म-संयम को दृढ़ करना था।