क्या जैन धर्म में भी शादी को सनातन धर्म की तरह जन्मजन्मान्तर का साथ माना गया है, शास्त्रों के रेफरेंस से
संक्षेप में जवाब:
- जैन धर्म में विवाह (विवाह/विवाह-संस्कार) एक नैतिक और सामाजिक जीवन-स्थिति है, जो गृहस्थ जीवन (गृहस्थाश्रम) के लिए है। यह जन्म-जन्मांतरों के साथ अटूट आधिकारिक बंधन नहीं माना जाता।
- मोक्ष पाने के लिए संसारिक बंधनों से हटकर कर्मों और तप-मार्ग पर चलना जरूरी है; घर-गृहनिष्ट जीवन के समय भी व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार ही जन्म-जन्मांतर के माइने बनाते रहते हैं।
- Digambar और Shwetambar दोनों परम्पराओं में विवाह की भूमिका वही होती है: एक सहचर बनकर धर्म-सार्तव्य, अहिंसा, सत्य आदि निभाने का साधन—पर यह पूरे जीवन-चक्र को एक "सनातन जन्म-जन्मांतर का साथ" के रूप में नहीं देखते।
- अगर आप विशेष शास्त्री संदर्भ चाहते हैं, तो यह विषय गृहस्थ-धर्म (गृहस्थाश्रम) और कर्म- bondage के प्रकाश में समझा जाता है; मोक्ष के मार्ग में संसारिक बंधनों का असर कर्मों के through होता है, न कि एक अपरिहार्य पारिवारिक बंधन के रूप में।
आप पढ़ सकते हैं इस विषय पर एक संक्षिप्त, Jain-Dharma-के अनुसार व्याख्या इस लिंक पर: < a href='https://jainknowledge.com/question/7986/marriage-in-jainism'>