जैन शास्त्र के अनुसार interest ब्याज lene देने की सीमा कितनी है
जैन धर्म में ब्याज लेना-देना को सामान्यतः निषेध माना गया है। पूरी तरह ब्याज मानना या उसे बढ़ाना ठीक नहीं माना जाता है।
- सच तो यह है कि शास्त्रों में ब्याज की कोई निश्चित संख्या/सीमा नहीं दी गई है। बल्कि मूल तौर पर ब्याज (रिब) को अव्यवहारिक, अनैतिक और विद्यावद्र्धक माना गया है।
- Digambar और Shwetambar दोनों परंपराओं में इस विषय की व्याख्या एक समान उद्देश्य रखती है: नैतिक वित्तीय व्यवहार और असत्य-लाभ से बचना। यहाँ वांछित दृष्टिकोण है कि ऋण देकर भी बिना ब्याज या न्यूनतम, पारदर्शी और निष्पक्ष व्यवहार किया जाए; पर यह शब्दशः एक “सीमा” के रूप में नहीं दी गई है।
- अर्थात किसी स्पष्ट निर्धारित ब्याज-सीमा का जिक्र शास्त्रों में नहीं है; अधिकतर वक्तव्य ब्याज-निषेध या ब्याज-त्याग की तरफ इशारा करते हैं।
अगर आप चाहें, तो मैं इसी विषय से जुड़ी जैन-ग्रंथों की मूल भाषा का अर्थ (arth) और सामान्य समझ को सरल शब्दों में और अधिक स्पष्ट कर दूं।