ग्रन्थ के नियमानुसार पुत्री को हिस्सा मिलता है या नहीं, यहां बात दिगम्बर और श्वेतांबर की नहीं हैं धर्म की होनी चाहिए, कृपया आप बांटने की कोशिश न करे
धर्म-दृष्टि से Jainism में स्त्री और पुरुष दोनों को समान आध्यात्मिक स्थिति प्राप्त है; मोक्ष के पथ पर दोनों के लिए समान अवसर है। लेकिन ग्रन्थों में “पुति/पुत्री को हिस्से” के बारे में एक समान और सार्वकालिक धारण नहीं मिलती—यह अधिकतर सांसारिक और समाजिक रीति-रिवाजों पर निर्भर रहता है, न कि केवल धर्म-सिद्धांत पर।
मुख्य बिंदु सरल हैं:
- लेकिन यह बात स्पष्ट है कि ज्ञान, नैतिक आचरण, तप, विमल विचार और मोक्ष-मार्ग समान हैं; जन्म-जात या संपत्ति-हक से धर्म की संभावनाओं में फर्क नहीं पड़ता।
- ग्रंथों में पुत्र-पुत्री के आचार-विचार, आचरण और धर्म-पालन के बारे में निर्देश अधिक स्पष्ट होते हैं; संपत्ति-वितरण जैसी सामाजिक-संस्थागत बातें समय और संस्कृति के अनुसार बदलती रहीं।
- इसलिए, धर्म का मूल उद्देश्य संपत्ति का बंटवारा तय करना नहीं है, बल्कि आत्म-विकास, भ्रातृत्व-सम्प्रवृत्ति, और संयम-मार्ग का पालन है।
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